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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 14

75 Sukta
15 Mantra
6/60/14
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ नो॒ गव्ये॑भि॒रश्व्यै॑र्वस॒व्यै॒३॒॑रुप॑ गच्छतम्। सखा॑यौ दे॒वौ स॒ख्याय॑ शं॒भुवे॑न्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे ॥१४॥

आ । नः॒ । गव्ये॑भिः । अश्व्यैः॑ । व॒स॒व्यैः॑ । उप॑ । ग॒च्छ॒त॒म् । सखा॑यौ । दे॒वौ । स॒ख्याय॑ । श॒म्ऽभुवा॑ । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । ता । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
आ नो गव्येभिरश्व्यैर्वसव्यै३रुप गच्छतम्। सखायौ देवौ सख्याय शंभुवेन्द्राग्नी ता हवामहे ॥

आ। नः। गव्येभिः। अश्व्यैः। वसव्यैः। उप। गच्छतम्। सखायौ। देवौ। सख्याय। शम्ऽभुवा। इन्द्राग्नी इति। ता। हवामहे ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 29 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको (इन्द्राग्नी) सूर्य और बिजुली के समान वर्त्तमान वा (शम्भुवा) सुख की भावना करानेवाले (देवौ) विद्वान् (सखायौ) मित्र (नः) हम लोगों को (सख्याय) मित्रता के लिये (गव्येभिः) गो घृत आदि पदार्थ (अश्व्यैः) अश्वादिकों में हुए गुणों और (वसव्यैः) धनादिकों में हुए सुखों के साथ वर्त्तमान तुम दोनों को हम लागे (हवामहे) बुलाते हैं (ता) वे तुम दोनों हम लोगों के (उप, आ, गच्छतम्) समीप आओ ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के मित्र होकर पदार्थविद्या सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, वे अवश्य विज्ञान को प्राप्त होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर मनुष्यों को किन के साथ मित्रता करनी चाहिये, इस विषयको कहते हैं ॥