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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 13

75 Sukta
15 Mantra
6/60/13
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒भा वा॑मिन्द्राग्नी आहु॒वध्या॑ उ॒भा राध॑सः स॒ह मा॑द॒यध्यै॑। उ॒भा दा॒तारा॑वि॒षां र॑यी॒णामु॒भा वाज॑स्य सा॒तये॑ हुवे वाम् ॥१३॥

उ॒भा । वा॒म् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । आ॒ऽहु॒वध्यै॑ । उ॒भा । राध॑सः । स॒ह । मा॒द॒यध्यै॑ । उ॒भा । दा॒तारौ॑ । इ॒षाम् । र॒यी॒णाम् । उ॒भा । वाज॑स्य । सा॒तये॑ । हु॒वे॒ । वा॒म् ॥

Mantra without Swara
उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसः सह मादयध्यै। उभा दाताराविषां रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम् ॥

उभा। वाम्। इन्द्राग्नी इति। आऽहुवध्यै। उभा। राधसः। सह। मादयध्यै। उभा। दातारौ। इषाम्। रयीणाम्। उभा। वाजस्य। सातये। हुवे। वाम् ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 29 Mantra » 3

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Meaning
हे शिल्पविद्या के अध्यापक और उपदेश करनेवालो ! जैसे (वाम्) तुम्हारे समीप स्थिर होकर (आहुवध्यै) आह्वान करने को (उभा) दोनों (इन्द्राग्नी) सूर्य्य और बिजुली को (राधसः) धन सम्बन्धी (मादयध्यै) आनन्द देने को (उभा) दोनों को (सह) एक साथ (उभा) और दोनों को (इषाम्) अन्नादि पदार्थों के वा (रयीणाम्) धनादि पदार्थों के (दातारौ) देनेवाले तथा (उभा) दोनों को (वाजस्य) विज्ञान वा सङ्ग्राम के (सातये) संविभाग के लिये मैं (हुवे) स्वीकार करता हूँ, वैसे ही (वाम्) तुम दोनों को इस विद्या का बोध कराऊँ ॥१३॥
Essence
जो मनुष्य वायु और बिजुली को यथावत् जान के कार्य्यों में उनका अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं, वे श्रीपति होते हैं ॥१३॥
Subject
फिर शिल्पीजन उनसे क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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