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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 11

75 Sukta
15 Mantra
6/60/11
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य इ॒द्ध आ॒विवा॑सति सु॒म्नमिन्द्र॑स्य॒ मर्त्यः॑। द्यु॒म्नाय॑ सु॒तरा॑ अ॒पः ॥११॥

यः । इ॒द्धे । आ॒ऽविवा॑सति । सु॒म्नम् । इन्द्र॑स्य । मर्त्यः॑ । द्यु॒म्नाय॑ । सु॒ऽतराः॑ । अ॒पः ॥

Mantra without Swara
य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः। द्युम्नाय सुतरा अपः ॥

यः। इद्धे। आऽविवासति। सुम्नम्। इन्द्रस्य। मर्त्यः। द्युम्नाय। सुऽतराः। अपः ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 29 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (मर्त्यः) मनुष्य (इद्धे) प्रदीप्त व्यवहार में (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य के (द्युम्नाय) यश वा धन के लिये (सुतराः) सुन्दरता से जिनमें तैरें उन (अपः) जलों को और (सुम्नम्) सुख को (आविवासति) सब ओर से सेवता है, वह भाग्यवान् होता है ॥११॥
Essence
मनुष्य जैसे प्रदीप्त अग्नि में सुगन्ध्यादि पदार्थों की हवि होमकर सिद्धकाम होते हैं, वैसे जो यश से धर्मकीर्त्ति वा स्वर्ग के लिये प्रयत्न करते हैं, वे निरन्तर श्रीमान् होते हैं ॥११॥
Subject
फिर मनुष्यों को किसके लिये क्या सेवन करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥