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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 10

75 Sukta
15 Mantra
6/60/10
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमी॑ळिष्व॒ यो अ॒र्चिषा॒ वना॒ विश्वा॑ परि॒ष्वज॑त्। कृ॒ष्णा कृ॒णोति॑ जि॒ह्वया॑ ॥१०॥

तम् । ई॒ळि॒ष्व॒ । यः । अ॒र्चिषा॑ । वना॑ । विश्वा॑ । प॒रि॒ऽस्वज॑त् । कृ॒ष्णा । कृ॒णोति॑ । जि॒ह्वया॑ ॥

Mantra without Swara
तमीळिष्व यो अर्चिषा वना विश्वा परिष्वजत्। कृष्णा कृणोति जिह्वया ॥

तम्। ईळिष्व। यः। अर्चिषा। वना। विश्वा। परिऽस्वजत्। कृष्णा। कृणोति। जिह्वया ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 28 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वन् जन ! जैसे सूर्य्य (अर्चिषा) सत्कार से (विश्वा) समस्त (वना) किरणों का (परिष्वजत्) सब ओर से सम्बन्ध करता है तथा (कृष्णा) पदार्थों की खीचों को =पदार्थों का कर्षण (कृणोति) करता है, वैसे (यः) जो (जिह्वया) जिह्वा से सत्य आचरण का सम्बन्ध करे (तम्) उसकी आप (ईळिष्व) प्रशंसा वा याचना करो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सब पदार्थ यथावत् दीखते हैं, वैसे ही विद्या से सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को कहते हैं ॥