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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 1

75 Sukta
15 Mantra
6/60/1
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श्नथ॑द्वृ॒त्रमु॒त स॑नोति॒ वाज॒मिन्द्रा॒ यो अ॒ग्नी सहु॑री सप॒र्यात्। इ॒र॒ज्यन्ता॑ वस॒व्य॑स्य॒ भूरेः॒ सह॑स्तमा॒ सह॑सा वाज॒यन्ता॑ ॥१॥

श्नथ॑त् । वृ॒त्रम् । उ॒त । स॒नो॒ति॒ । वाज॑म् । इन्द्रा॑ । यः । अ॒ग्नी इति॑ । सहु॑री॒ इति॑ । स॒प॒र्यात् । इ॒र॒ज्यन्ता॑ । व॒स॒व्य॑स्य । भूरेः॒ । सहः॑ऽतमा॑ । सह॑सा । वा॒ज॒ऽयन्ता॑ ॥

Mantra without Swara
श्नथद्वृत्रमुत सनोति वाजमिन्द्रा यो अग्नी सहुरी सपर्यात्। इरज्यन्ता वसव्यस्य भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ॥

श्नथत्। वृत्रम्। उत। सनोति। वाजम्। इन्द्रा। यः। अग्नी इति। सहुरी इति। सपर्यात्। इरज्यन्ता। वसव्यस्य। भूरेः। सहःऽतमा। सहसा। वाजऽयन्ता ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 27 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो विद्वान् (सहुरी) सहनशील (इरज्यन्ता) ऐश्वर्य को सिद्ध करते हुए वा (सहस्तमा) अतीव सहन करनेवाले (सहसा) बल से (वाजयन्ता) अन्नादिकों की इच्छा करते हुए (इन्द्रा, अग्नी) पवन और बिजुली को (श्नथत्) ताड़ता है (उत) और (सनोति) प्राप्त होता है तथा (वसव्यस्य) धनादि पदार्थों में हुए (भूरेः) बहुत सुख से (वृत्रम्) धन को प्राप्त होता है और (वाजम्) अन्न को (सपर्यात्) सेवे, वही ऐश्वर्य को पावे ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो आप वायु और बिजुली की विद्या को जानो तो महान् ऐश्वर्यवाले होकर महान् राज्यके स्वामी होओ ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह ऋचावाले साठवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में कौन ऐश्वर्य को पाता है, इस विषय को कहते हैं ॥

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