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Rigveda Mandal 6 / Sukta 6 / Mantra 5

75 Sukta
7 Mantra
6/6/5
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध॑ जि॒ह्वा पा॑पतीति॒ प्र वृष्णो॑ गोषु॒युधो॒ नाशनिः॑ सृजा॒ना। शूर॑स्येव॒ प्रसि॑तिः क्षा॒तिर॒ग्नेर्दु॒र्वर्तु॑र्भी॒मो द॑यते॒ वना॑नि ॥५॥

अध॑ । जि॒ह्वा । पा॒प॒ती॒ति॒ । प्र । वृष्णः॑ । गो॒षु॒ऽयुधः॑ । न । अ॒शनिः॑ । सृ॒जा॒ना । शूर॑स्यऽइव । प्रऽसि॑तिः । क्षा॒तिः । अ॒ग्नेः । दुः॒ऽवर्तुः॑ । भी॒मः । द॒य॒ते॒ । वना॑नि ॥

Mantra without Swara
अध जिह्वा पापतीति प्र वृष्णो गोषुयुधो नाशनिः सृजाना। शूरस्येव प्रसितिः क्षातिरग्नेर्दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि ॥

अध। जिह्वा। पापतीति। प्र। वृष्णः। गोषुऽयुधः। न। अशनिः। सृजाना। शूरस्यऽइव। प्रऽसितिः। क्षातिः। अग्नेः। दुःऽवर्तुः। भीमः। दयते। वनानि ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! (गोषुयुधः) वाणियों में युद्ध करनेवाले (वृष्णः) बलिष्ठों को (जिह्वा) वाणी (न) नहीं (पापतीति) अत्यन्त वारवार प्राप्त होती है (अध) इसके अनन्तर (अशनिः) बिजुली जैसे वैसे (सृजाना) उत्पन्न किया गया (शूरस्येव) शूरवीर के सदृश (अग्नेः) अग्नि के समान प्रकाशमान (दुर्वर्त्तुः) दुःख के साथ वर्त्तमान से युक्त का (प्रसितिः) प्रकृष्ट बन्धन (क्षातिः) और नाश (भीमः) भयंकर हुआ (वनानि) वनों को (प्र, दयते) नष्ट करता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य धर्म्म से पतित न होकर धार्म्मिकों में शान्त और दुष्टों में अग्नि के सदृश भयंकर होते हैं, वे ही बलवान् गिने जाते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥