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Rigveda Mandal 6 / Sukta 6 / Mantra 1

75 Sukta
7 Mantra
6/6/1
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र नव्य॑सा॒ सह॑सः सू॒नुमच्छा॑ य॒ज्ञेन॑ गा॒तुमव॑ इ॒च्छमा॑नः। वृ॒श्चद्व॑नं कृ॒ष्णया॑मं॒ रुश॑न्तं वी॒ती होता॑रं दि॒व्यं जि॑गाति ॥१॥

प्र । नव्य॑सा । सह॑सः । सू॒नुम् । अच्छ॑ । य॒ज्ञेन॑ । गा॒तुम् । अवः॑ । इ॒च्छमा॑नः । वृ॒श्चत्ऽव॑नम् । कृ॒ष्णया॑मम् । रुश॑न्तम् । वी॒ती । होता॑रम् । दि॒व्यम् । जि॒गा॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
प्र नव्यसा सहसः सूनुमच्छा यज्ञेन गातुमव इच्छमानः। वृश्चद्वनं कृष्णयामं रुशन्तं वीती होतारं दिव्यं जिगाति ॥

प्र। नव्यसा। सहसः। सूनुम्। अच्छ। यज्ञेन। गातुम्। अवः। इच्छमानः। वृश्चत्ऽवनम्। कृष्णयामम्। रुशन्तम्। वीती। होतारम्। दिव्यम्। जिगाति ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यज्ञेन) सङ्गतिरूप यज्ञ से (गातुम्) पृथिवी और (अवः) रक्षण की (इच्छमानः) इच्छा करता हुआ (नव्यसा) अत्यन्त नवीन व्यवहार से (सहसः) बलवान् के (सूनुम्) सन्तान को और (कृष्णयामम्) आकर्षित किया मार्ग जिससे ऐसे (रुशन्तम्) हिंसा करते हुए (वृश्चद्वनम्) काटता है वन जिसमें उसके समान (वीती) व्याप्ति से (होतारम्) देनेवाले (दिव्यम्) शुद्धव्यवहारों में प्रकट हुए को (अच्छ) अच्छे प्रकार (प्र, जिगाति) प्राप्त होता है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! आप लोग ब्रह्मचर्य्य से बलिष्ठ होकर सन्तानों को उत्पन्न करो जिससे रोगरहित, बलयुक्त और उत्तम स्वभावयुक्त सन्तान होकर आप लोगों को निरन्तर सुखयुक्त करें ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले छठे सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्यों को सन्तान किस प्रकार करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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