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Rigveda Mandal 6 / Sukta 59 / Mantra 4

75 Sukta
10 Mantra
6/59/4
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य इ॑न्द्राग्नी सु॒तेषु॑ वां॒ स्तव॒त्तेष्वृ॑तावृधा। जो॒ष॒वा॒कं वद॑तः पज्रहोषिणा॒ न दे॑वा भ॒सथ॑श्च॒न ॥४॥

यः । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । सु॒तेषु॑ । वा॒म् । स्तव॑त् । तेषु॑ । ऋ॒त॒ऽवृ॒धा॒ । जो॒ष॒ऽवा॒कम् । वद॑तः । प॒ज्र॒ऽहो॒षि॒णा॒ । न । दे॒वा॒ । भ॒सथः॑ । च॒न ॥

Mantra without Swara
य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृतावृधा। जोषवाकं वदतः पज्रहोषिणा न देवा भसथश्चन ॥

यः। इन्द्राग्नी इति। सुतेषु। वाम्। स्तवत्। तेषु। ऋतऽवृधा। जोषऽवाकम्। वदतः। पज्रऽहोषिणा। न। देवा। भसथः। चन ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पज्रहोषिणा) प्राप्त हुई वाणी वा घोषयुक्त (ऋतावृधा) सत्य बढ़ानेवाले (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उपदेशको ! (यः) जो (तेषु) उन (सुतेषु) उत्पन्न हुए पदार्थों में (वाम्) तुम दोनों की (स्तवत्) प्रशंसा करे वा जो (देवा) विद्वान् जन (चन) भी (न) नहीं (भसथः) व्यर्थ वाद करते हैं, उस सर्वजन के प्रति तुम दोनों (जोषवाकम्) प्रीति करनेवाले वचन (वदतः) कहते हो, वह सर्वजन भी तुम्हारे प्रति कहे ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! सर्व पदार्थों में प्रविष्ट वायु और बिजुली को जानकर ऐश्वर्य को प्राप्त होकर रूखी असत्य किया और लोक विद्वेषी जनों को जान सबके उपकार के लिये सत्य प्रिय वाक्य सर्वदा कहो ॥४॥
Subject
फिर विद्वान् जन कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥