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Rigveda Mandal 6 / Sukta 59 / Mantra 1

75 Sukta
10 Mantra
6/59/1
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र नु वो॑चा सु॒तेषु॑ वां वी॒र्या॒३॒॑ यानि॑ च॒क्रथुः॑। ह॒तासो॑ वां पि॒तरो॑ दे॒वश॑त्रव॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ जीव॑थो यु॒वम् ॥१॥

प्र । नु । वो॒च॒ । सु॒तेषु॑ । वा॒म् । वी॒र्या॑ । यानि॑ । च॒क्रथुः॑ । ह॒तासः॑ । वा॒म् । पि॒तरः॑ । दे॒वऽश॑त्रवः । इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । जीव॑थः । यु॒वम् ॥

Mantra without Swara
प्र नु वोचा सुतेषु वां वीर्या३ यानि चक्रथुः। हतासो वां पितरो देवशत्रव इन्द्राग्नी जीवथो युवम् ॥

प्र। नु। वोच। सुतेषु। वाम्। वीर्या। यानि। चक्रथुः। हतासः। वाम्। पितरः। देवऽशत्रवः। इन्द्राग्नी इति। जीवथः। युवम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उपदेशको ! (युवम्) तुम दोनों (यानि) जिन (सुतेषु) उत्पन्न हुए पदार्थों में (वीर्या) पराक्रमों को (चक्रथुः) किया करते हो उनसे (वाम्) तुम दोनों के जो (देवशत्रवः) विद्वानों से द्वेष करनेवाले शत्रु (हतासः) नष्ट हों और तुम दोनों बहुत समय तक (जीवथः) जीवते हो यह (वाम्) तुम दोनों को मैं (नु) शीघ्र (प्र, वोचा) उपदेश देता हूँ जिससे तुम दोनों के (पितरः) पालनेवाले भी ऐसा (वाम्) तुम दोनों को उपदेश दें ॥१॥
Essence
जो मनुष्य उत्पन्न हुए मनुष्यों में पराक्रम की उन्नति करते हैं, उनके शत्रु विलय (नाश) को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब दस ऋचावाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करके बलिष्ठ हों, इस विषय को कहते हैं ॥