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Rigveda Mandal 6 / Sukta 58 / Mantra 4

75 Sukta
4 Mantra
6/58/4
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पू॒षा सु॒बन्धु॑र्दि॒व आ पृ॑थि॒व्या इ॒ळस्पति॑र्म॒घवा॑ द॒स्मव॑र्चाः। यं दे॒वासो॒ अद॑दुः सू॒र्यायै॒ कामे॑न कृ॒तं त॒वसं॒ स्वञ्च॑म् ॥४॥

पू॒षा । सु॒ऽबन्धुः॑ । दि॒वः । आ । पृ॒थि॒व्याः । इ॒ळः । पतिः॑ । म॒घऽवा॑ । द॒स्मऽव॑र्चाः । यम् । दे॒वासः॑ । अद॑दुः । सू॒र्यायै॑ । कामे॑न । कृ॒तम् । त॒वस॑म् । सु॒ऽअञ्च॑म् ॥

Mantra without Swara
पूषा सुबन्धुर्दिव आ पृथिव्या इळस्पतिर्मघवा दस्मवर्चाः। यं देवासो अददुः सूर्यायै कामेन कृतं तवसं स्वञ्चम् ॥

पूषा। सुऽबन्धुः। दिवः। आ। पृथिव्याः। इळः। पतिः। मघऽवा। दस्मऽवर्चाः। यम्। देवासः। अददुः। सूर्यायै। कामेन। कृतम्। तवसम्। सुऽअञ्चम् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यम्) जिसको (देवासः) विद्वान् जन (कामेन) कामना से (कृतम्) किये हुए (तवसम्) बलिष्ठ (स्वञ्चम्) सुन्दरता से जाते हुए अर्थात् शरीर और आत्मा के बल से युक्त युवा मनुष्य को (सूर्यायै) सूर्य के समान शुभ गुण और स्वभावों से प्रकाशित कन्या के लिये (अददुः) देते हैं वह (सुबन्धुः) सुन्दर भ्राता वा मित्रोंवाला (मघवा) बहुत ऐश्वर्य्ययुक्त (दस्मवर्चाः) नष्ट होते हुए पदार्थों में प्रकाश रखनेवाला (पूषा) भूमि के समान पुष्ट वा पुष्टि करनेवाला (दिवः) बिजुली और (पृथिव्याः) भूमि तथा (इळः) वाणी का (पतिः) स्वामी होता हुआ सुख को (आ) ग्रहण करता है ॥४॥
Essence
जो ब्रह्मचर्य्य से पूर्ण युवावस्था को प्राप्त हुए अपने सदृश बहुओं को प्राप्त होकर ऋतुगामी अर्थात् ऋतुकाल में स्त्रीभोग करनेवाले होकर सुन्दर पुष्ट अङ्ग और बुद्धि बल विद्या और शिक्षा को प्राप्त हों, वे ही भूगर्भ वा विद्युदादि विद्या को प्राप्त हो सकते हैं और क्षुद्राशय नहीं ॥४॥ इस सूक्त में विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अट्ठावनवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर कौन विद्या को प्राप्त होने के योग्य होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

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