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Rigveda Mandal 6 / Sukta 55 / Mantra 4

75 Sukta
6 Mantra
6/55/4
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पू॒षणं॒ न्व१॒॑जाश्व॒मुप॑ स्तोषाम वा॒जिन॑म्। स्वसु॒र्यो जा॒र उ॒च्यते॑ ॥४॥

पू॒षण॑म् । नु । अ॒जऽअ॑श्वम् । उप॑ । स्तो॒षा॒म॒ । वा॒जिन॑म् । स्वसुः॑ । यः । जा॒रः । उ॒च्यते॑ ॥

Mantra without Swara
पूषणं न्व१जाश्वमुप स्तोषाम वाजिनम्। स्वसुर्यो जार उच्यते ॥

पूषणम्। नु। अजऽअश्वम्। उप। स्तोषाम। वाजिनम्। स्वसुः। यः। जारः। उच्यते ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (स्वसुः) बहिन के समान वर्त्तमान उषा का (जारः) जीर्ण करानेवाला (उच्यते) कहा जाता है उस (वाजिनम्) ज्ञान और बल का देनेवाला (अजाश्वम्) जिसमें बकरी और घोड़े विद्यमान (पूषणम्) जो पुष्टि करनेवाला है, उस आदित्य की हम (नु) शीघ्र (उप, स्तोषाम) प्रशंसा करें ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य रात्रि का निवारण करनेवाला है, वैसे ही प्रजाजनों में जारकर्म में वर्त्तमान मनुष्यों का निवारण करो ॥४॥
Subject
फिर किन गुणों से उत्कृष्ट होता है, इस विषय को कहते हैं ॥