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Rigveda Mandal 6 / Sukta 54 / Mantra 4

75 Sukta
10 Mantra
6/54/4
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो अ॑स्मै ह॒विषावि॑ध॒न्न तं पू॒षापि॑ मृष्यते। प्र॒थ॒मो वि॑न्दते॒ वसु॑ ॥४॥

यः । अ॒स्मै॒ । ह॒विषा । अवि॑धत् । न । तम् । पू॒षा । अपि॑ । मृ॒ष्य॒ते॒ । प्र॒थ॒मः । वि॒न्द॒ते॒ । वसु॑ ॥

Mantra without Swara
यो अस्मै हविषाविधन्न तं पूषापि मृष्यते। प्रथमो विन्दते वसु ॥

यः। अस्मै। हविषा। अविधत्। न। तम्। पूषा। अपि। मृष्यते। प्रथमः। विन्दते। वसु ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (यः) जो (हविषा) देने वा लेने से (अस्मै) इसके लिये (वसु) बहुत धन का (अविधत्) विधान करता है वा (प्रथमः) पहिला कारुक धन (विन्दते) पाता है (तम्) उसको (पूषा) पुष्टि करनेवाला (अपि) भी (न) नहीं (मृष्यते) सहता है ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो पहिले से शिल्पविद्या को पाकर क्रिया से पदार्थों का निर्माण करता है, वह बहुत धन को प्राप्त होता है, उसके सदृश पुष्ट कोई नहीं होता है ॥४॥
Subject
कौन महान् श्रीमान् होता है, इस विषय को कहते हैं ॥