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Rigveda Mandal 6 / Sukta 54 / Mantra 3

75 Sukta
10 Mantra
6/54/3
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पू॒ष्णश्च॒क्रं न रि॑ष्यति॒ न कोशोऽव॑ पद्यते। नो अ॑स्य व्यथते प॒विः ॥३॥

पू॒ष्णः । च॒क्रम् । न । रि॒ष्य॒ति॒ । न । कोशः॑ । अव॑ । प॒द्य॒ते॒ । नो इति॑ । अ॒स्य॒ । व्य॒थ॒ते॒ । प॒विः ॥

Mantra without Swara
पूष्णश्चक्रं न रिष्यति न कोशोऽव पद्यते। नो अस्य व्यथते पविः ॥

पूष्णः। चक्रम्। न। रिष्यति। न। कोशः। अव। पद्यते। नो इति। अस्य। व्यथते। पविः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस (अस्य) इस (पूष्णः) पुष्ट करनेवाले शिल्पी विद्वान् का (चक्रम्) कलायन्त्रादि (न, रिष्यति) हिंसन नहीं करता तथा (कोशः) धनसमूह (न, अव, पद्यते) अप्राप्त नहीं होता अर्थात् प्राप्त ही होता है और (पविः) शस्त्रास्त्रविद्या (नो) नहीं (व्यथते) होती अर्थात् शत्रुजन जिसको नहीं मथते, उसी का सङ्ग हम लोग करें ॥३॥
Essence
जिस विद्वान् का पूर्ण बल है, जिसका एकछत्र राज्य है, जिसका कोश सब ओर से पूरा होता और शत्रुओं में जिसका शस्त्र नहीं नष्ट होता है, उसके राज्य में सब जन निर्भय होकर बसें ॥३॥
Subject
किसका कर्त्तव्य नष्ट नहीं होता, इस विषय को कहते हैं ॥