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Rigveda Mandal 6 / Sukta 53 / Mantra 8

75 Sukta
10 Mantra
6/53/8
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यां पू॑षन्ब्रह्म॒चोद॑नी॒मारां॒ बिभ॑र्ष्याघृणे। तया॑ समस्य॒ हृद॑य॒मा रि॑ख किकि॒रा कृ॑णु ॥८॥

याम् । पू॒ष॒न् । ब्र॒ह्म॒ऽचोद॑नीम् । आरा॑म् । बिभ॑र्षि । आ॒घृ॒णे॒ । तया॑ । स॒म॒स्य॒ । हृद॑यम् । आ । रि॒ख॒ । कि॒कि॒रा । कृ॒णु॒ ॥

Mantra without Swara
यां पूषन्ब्रह्मचोदनीमारां बिभर्ष्याघृणे। तया समस्य हृदयमा रिख किकिरा कृणु ॥

याम्। पूषन्। ब्रह्मऽचोदनीम्। आराम्। बिभर्षि। आघृणे। तया। समस्य। हृदयम्। आ। रिख। किकिरा। कृणु ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पूषन्) पुष्टि करनेवाले (आघृणे) सब ओर से न्याय के प्रकाश करनेवाले ! आप (याम्) जिस (ब्रह्मचोदनीम्) विद्या और धन की प्राप्ति के लिये प्रेरणा करने तथा काष्ठ के विभाग करनेवाली आरी को (बिभर्षि) धारण करते हो (तया) उससे (समस्य) तुल्य के समान अर्थात् जो सब में बुद्धिवाला है उसके (हृदयम्) हृदय को (आ, रिख) अच्छे प्रकार लिखो और (किकिरा) उत्तम गुणों को विकीर्ण (कृणु) करो फैलाओ ॥८॥
Essence
हे राजन् ! आप विद्या और धन की प्राप्ति की प्रेरणा के समान राजनीति को धारण करो, जिससे सब की न्यायव्यवस्था हो ॥८॥
Subject
फिर विद्वान् को कैसे किसके लिये प्रेरणा करनी योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥