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Rigveda Mandal 6 / Sukta 53 / Mantra 5

75 Sukta
10 Mantra
6/53/5
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
परि॑ तृन्धि पणी॒नामार॑या॒ हृद॑या कवे। अथे॑म॒स्मभ्यं॑ रन्धय ॥५॥

परि॑ । तृ॒न्धि॒ । प॒णी॒नाम् । आर॑या । हृद॑या । क॒वे॒ । अथ॑ । ई॒म् । अ॒स्मभ्य॑म् । र॒न्ध॒य॒ ॥

Mantra without Swara
परि तृन्धि पणीनामारया हृदया कवे। अथेमस्मभ्यं रन्धय ॥

परि। तृन्धि। पणीनाम्। आरया। हृदया। कवे। अथ। ईम्। अस्मभ्यम्। रन्धय ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (कवे) विद्वन् राजन् ! आप (आरया) उत्तम कोड़ा से (पणीनाम्) द्यूत आदि व्यवहार करनेवाले पुरुषों के (हृदया) हृदयों को (परि, तृन्धि) सब ओर से मारो (अथ) इसके अनन्तर (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (ईम्) सब ओर से दुष्टों को (रन्धय) पीड़ित करो और हमारे लिये सुख देओ ॥५॥
Essence
हे राजन् ! आप जो अपवित्र शिक्षा देनेवाले और छली पुरुष अपने राज्य में हों, उनको अच्छे प्रकार दण्डो, जिससे न्यायमार्ग के बीच हम लोग सुखी हों ॥५॥
Subject
फिर राजा से कौन पीड़ा देने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

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