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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 9

75 Sukta
17 Mantra
6/52/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उप॑ नः सू॒नवो॒ गिरः॑ शृ॒ण्वन्त्व॒मृत॑स्य॒ ये। सु॒मृ॒ळी॒का भ॑वन्तु नः ॥९॥

उप॑ । नः॒ । सू॒नवः॑ । गिरः॑ । शृ॒ण्वन्तु॑ । अ॒मृत॑स्य । ये । सु॒ऽमृ॒ळी॒काः । भ॒व॒न्तु॒ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये। सुमृळीका भवन्तु नः ॥

उप। नः। सूनवः। गिरः। शृण्वन्तु। अमृतस्य। ये। सुऽमृळीकाः। भवन्तु। नः ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् वा विद्वानो ! (ये) जो (नः) हमारे (सूनवः) सन्तान हों वे (अमृतस्य) नाशरहित विज्ञान की (गिरः) विद्यायुक्त वाणियों को (उप, शृण्वन्तु) समीप में सुनें तथा (सुमृळीकाः) सुन्दर सुखवाले होकर (नः) हमारी सेवा करनेवाले (भवन्तु) हों ॥९॥
Essence
पितृजनों को राजनीति वा अपने कुल में यह दृढ़ नियम करना चाहिये कि जितने हमारे सन्तान हैं, वे ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं के समस्त ग्रहण के लिये ब्रह्मचर्य्य आश्रम को करें, जो इसका विनाश करे, उसे राजा वा कुलीन निरन्तर दण्ड देवें ॥९॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा नियम करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥