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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 5

75 Sukta
17 Mantra
6/52/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि॒श्व॒दानीं॑ सु॒मन॑सः स्याम॒ पश्ये॑म॒ नु सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम्। तथा॑ कर॒द्वसु॑पति॒र्वसू॑नां दे॒वाँ ओहा॒नोऽव॒साग॑मिष्ठः ॥५॥

वि॒श्व॒ऽदानी॑म् । सु॒ऽमन॑सः । स्या॒म॒ । पश्ये॑म । नु । सूर्य॑म् । उ॒च्चर॑न्तम् । तथा॑ । क॒र॒त् । वसु॑ऽपतिः । वसू॑नाम् । दे॒वान् । ओहा॑नः । अव॑सा । आऽग॑मिष्ठः ॥

Mantra without Swara
विश्वदानीं सुमनसः स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्। तथा करद्वसुपतिर्वसूनां देवाँ ओहानोऽवसागमिष्ठः ॥

विश्वऽदानीम्। सुऽमनसः। स्याम। पश्येम। नु। सूर्यम्। उच्चरन्तम्। तथा। करत्। वसुऽपतिः। वसूनाम्। देवान्। ओहानः। अवसा। आऽगमिष्ठः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (अवसा) रक्षा आदि के साथ (आगमिष्ठः) अतीव आने और (वसूनाम्) वसुओं के बीच (वसुपतिः) पदार्थों की पालना करनेवाले और (ओहानः) रक्षक आप जैसे हम लोगों को (देवान्) विद्वान् (करत्) करें (तथा) वैसे हम लोग (विश्वदानीम्) सर्वदा (सूर्य्यम्) सूर्यमण्डल जो (उच्चरन्तम्) ऊपर को चढ़ता है उसे (पश्येम) देखें और (नु) शीघ्र (सुमनसः) प्रसन्नचित्त (स्याम) होवें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रीति से अध्यापक और उपदेशक विद्यार्थियों को और उपदेश सुननेवालों को विद्वान् करके सुखी करते हैं, वैसे ही पढ़नेवालों और उपदेश सुननेवालों को चाहिये कि विद्वान् होकर भी इनका सदा सत्कार करें ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥