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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 16

75 Sukta
17 Mantra
6/52/16
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्नी॑पर्जन्या॒वव॑तं॒ धियं॑ मे॒ऽस्मिन्हवे॑ सुहवा सुष्टु॒तिं नः॑। इळा॑म॒न्यो ज॒नय॒द्गर्भ॑म॒न्यः प्र॒जाव॑ती॒रिष॒ आ ध॑त्तम॒स्मे ॥१६॥

अग्नी॑पर्जन्यौ । अव॑तम् । धिय॑म् । मे॒ । अ॒स्मिन् । हवे॑ । सु॒ऽह॒वा॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । नः॒ । इळा॑म् । अ॒न्यः । ज॒नय॑त् । गर्भ॑म् । अ॒न्यः । प्र॒जाऽव॑तीः । इषः॑ । आ । ध॒त्त॒म् । अ॒स्मे इति॑ ॥

Mantra without Swara
अग्नीपर्जन्याववतं धियं मेऽस्मिन्हवे सुहवा सुष्टुतिं नः। इळामन्यो जनयद्गर्भमन्यः प्रजावतीरिष आ धत्तमस्मे ॥

अग्नीपर्जन्यौ। अवतम्। धियम्। मे। अस्मिन्। हवे। सुऽहवा। सुऽस्तुतिम्। नः। इळाम्। अन्यः। जनयत्। गर्भम्। अन्यः। प्रजाऽवतीः। इषः। आ। धत्तम्। अस्मे इति ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुहवा) सुन्दर प्रशंसित अध्यापक और उपदेशको ! तुम (अग्नीपर्जन्यौ) बिजुलीरूप अग्नि और मेघ के तुल्य (अस्मिन्) इस (हवे) प्रशंसनीय धर्मयुक्त व्यवहार में तुम दोनों (मे) मेरी (धियम्) बुद्धि की (अवतम्) रक्षा करो तथा (नः) हमारी (सुष्टुतिम्) शोभन प्रशंसा की रक्षा करो जैसे अग्नि और मेघ के बीच (अन्यः) और बिजुलीमय अग्नि (इळाम्) महान् वाणी को (अन्यः) और मेघ (गर्भम्) गर्भरूप (जनयत्) उत्पन्न करता है, वैसे (अस्मे) हमारी (प्रजावतीः) बहुप्रशंसित प्रजायुक्त (इषः) अन्नादि पदार्थों की इच्छाओं को (आ, धत्तम्) सब ओर से धारण करो ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो वह्नि और मेघ के समान सब की बुद्धि के बढ़ानेवाले वा रक्षा करनेवाले, सब प्रजाजनों को सुख में धारण करते हैं, वे जैसे मेघ पृथिवी पर गर्भ को धारण कर ओषधियों को उत्पन्न करता और जैसे अग्नि वाणी का विधान करता अर्थात् बिजुलीरूप होकर तड़कता है, वैसे वे सुखों का विधान करनेवाले होते हैं, यह आप जानो ॥१६॥
Subject
फिर वे विद्वान् कैसे क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥