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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 15

75 Sukta
17 Mantra
6/52/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये के च॒ ज्मा म॒हिनो॒ अहि॑माया दि॒वो ज॑ज्ञि॒रे अ॒पां स॒धस्थे॑। ते अ॒स्मभ्य॑मि॒षये॒ विश्व॒मायुः॒ क्षप॑ उ॒स्रा व॑रिवस्यन्तु दे॒वाः ॥१५॥

ये । के । च॒ । ज्मा । म॒हिनः॑ । अहि॑ऽमायाः । दि॒वः । ज॒ज्ञि॒रे । अ॒पाम् । स॒धऽस्थे॑ । ते । अ॒स्मभ्य॑म् । इ॒षये॑ । विश्व॑म् । आयुः॑ । क्षपः॑ । उ॒स्राः । व॒रि॒व॒स्य॒न्तु॒ । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
ये के च ज्मा महिनो अहिमाया दिवो जज्ञिरे अपां सधस्थे। ते अस्मभ्यमिषये विश्वमायुः क्षप उस्रा वरिवस्यन्तु देवाः ॥

ये। के। च। ज्मा। महिनः। अहिऽमायाः। दिवः। जज्ञिरे। अपाम्। सधऽस्थे। ते। अस्मभ्यम्। इषये। विश्वम्। आयुः। क्षपः। उस्राः। वरिवस्यन्तु। देवाः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (के, च) कोई भी (महिनः) महान् जैसे (ज्मा) पृथिवी के बीच (अहिमायाः) मेघ की कुटिल गतियाँ (दिवः) सूर्य्य के प्रकाश से (अपाम्) जलों के (सधस्थे) समानस्थानवाले मेघमण्डल में (जज्ञिरे) उत्पन्न होती हैं, वैसे वर्त्तमान (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (इषये) अन्न वा विज्ञान के अर्थ (क्षपः) रात्रि (उस्राः) दिन और (विश्वम्) पूर्ण (आयुः) जीवन को (वरिवस्यन्तु) सेवें (ते) वे (देवाः) दिव्यगुण वा विद्वान् जन हम लोगों से निरन्तर सेवने योग्य हैं ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो इस वर्त्तमान समय में दिन-रात्रि मनुष्यों के आरोग्य, आयु और विज्ञान के बढ़ाने और मेघ के समान पुष्टि करनेवाले हों, वे ही सब से सत्कार करने योग्य हैं ॥१५॥
Subject
फिर मनुष्यों से कौन नित्य सत्कार करने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

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