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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 12

75 Sukta
17 Mantra
6/52/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒मं नो॑ अग्ने अध्व॒रं होत॑र्वयुन॒शो य॑ज। चि॒कि॒त्वान्दैव्यं॒ जन॑म् ॥१२॥

इ॒मम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒ध्व॒रम् । होतः॑ । व॒यु॒न॒ऽशः । य॒ज॒ । चि॒कि॒त्वान् । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥

Mantra without Swara
इमं नो अग्ने अध्वरं होतर्वयुनशो यज। चिकित्वान्दैव्यं जनम् ॥

इमम्। नः। अग्ने। अध्वरम्। होतः। वयुनऽशः। यज। चिकित्वान्। दैव्यम्। जनम् ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 2

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Meaning
हे (होतः) देनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान राजन् ! आप (वयुनशः) उत्तम ज्ञान से (नः) हमारे (इमम्) इस (अध्वरम्) न नष्ट करने योग्य न्याय व्यवहार को (चिकित्वान्) जाननेवाले आप (दैव्यम्) विद्वानों से सत्कार को प्राप्त हुए (जनम्) शुभाचरणों से प्रसिद्ध जन को (यज) अच्छे प्रकार प्राप्त हों ॥१२॥
Essence
हे राजा प्रजाजन ! आप जो हमारे बीच शुभ गुणकर्मस्वभावयुक्त हो, उसी को राज्य करने में अच्छे प्रकार युक्त करो ॥१२॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे राजा को करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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