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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 11

75 Sukta
17 Mantra
6/52/11
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्तो॒त्रमिन्द्रो॑ म॒रुद्ग॑ण॒स्त्वष्टृ॑मान्मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। इ॒मा ह॒व्या जु॑षन्त नः ॥११॥

स्तो॒त्रम् । इन्द्रः॑ । म॒रुत्ऽग॑णः । त्वष्टृ॑ऽमान् । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । इ॒मा । ह॒व्या । जु॒ष॒न्त॒ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
स्तोत्रमिन्द्रो मरुद्गणस्त्वष्टृमान्मित्रो अर्यमा। इमा हव्या जुषन्त नः ॥

स्तोत्रम्। इन्द्रः। मरुत्ऽगणः। त्वष्टृऽमान्। मित्रः। अर्यमा। इमा। हव्या। जुषन्त। नः ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! आप जो (मरुद्गणः) जिसके उत्तम मनुष्यों का समूह और (त्वष्टृमान्) उत्तम शिल्पीजन विद्यमान हैं तथा (मित्रः) जो कि सबका मित्र (अर्यमा) न्याय करनेवाला और (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा हो उसके साथ (नः) हमारे (स्तोत्रम्) उस स्तोत्र को जिससे स्तुति करते हो और (इमा) इन (हव्या) लेने-देने योग्य अन्नादि पदार्थों को (जुषन्त) सेवो ॥११॥
Essence
वे ही मनुष्य चाहे हुए पदार्थों को पा सकते हैं, जो सब के लिये श्रेष्ठ पुरुष को अधिष्ठाता करते हैं ॥११॥
Subject
फिर मनुष्य किसके साथ क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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