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Rigveda Mandal 6 / Sukta 52 / Mantra 1

75 Sukta
17 Mantra
6/52/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न तद्दि॒वा न पृ॑थि॒व्यानु॑ मन्ये॒ न य॒ज्ञेन॒ नोत शमी॑भिरा॒भिः। उ॒ब्जन्तु॒ तं सु॒भ्वः१॒॑ पर्व॑तासो॒ नि ही॑यतामतिया॒जस्य॑ य॒ष्टा ॥१॥

न । तत् । दि॒वा । न । पृ॒थि॒व्या । अनु॑ । म॒न्ये॒ । न । य॒ज्ञेन॑ । न । उ॒त । शमी॑भिः । आ॒भिः । उ॒ब्जन्तु॑ । तम् । सु॒ऽभ्वः॑ । पर्व॑तासः । नि । ही॒य॒ता॒म् । अ॒ति॒ऽया॒जस्य॑ । य॒ष्टा ॥

Mantra without Swara
न तद्दिवा न पृथिव्यानु मन्ये न यज्ञेन नोत शमीभिराभिः। उब्जन्तु तं सुभ्वः१ पर्वतासो नि हीयतामतियाजस्य यष्टा ॥

न। तत्। दिवा। न। पृथिव्या। अनु। मन्ये। न। यज्ञेन। न। उत। शमीभिः। आभिः। उब्जन्तु। तम्। सुऽभ्वः। पर्वतासः। नि। हीयताम्। अतिऽयाजस्य। यष्टा ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (सुभ्वः) जो अच्छे होते हैं, वे (पर्वतासः) मेघ (तम्) उसको (उब्जन्तु) कुटिल करें, वैसे (अतियाजस्य) जो अतीव यज्ञ करने योग्य है उसका (यष्टा) सङ्ग करनेवाला वर्त्तमान है वह (तत्) उस कारण से (दिवा) दिन में (न)(नि, हीयताम्) छोड़ने योग्य है (न)(पृथिव्या) भूमि से (न)(यज्ञेन) होम आदि कर्म से (न)(उत) और (आभिः) क्रियाओं से वा (शमीभिः) कर्मों से छोड़ने योग्य है, उसे मैं (अनु, मन्ये) अनुकूलता से मानता हूँ ॥१॥
Essence
जो सुख मेघों से उत्पन्न होता है, वह सुख न दिवस में, न पृथिवी, न सङ्गति, न कर्म से होता है, इससे यज्ञ करनेवाला ही सुखभागी होता है ॥१॥
Subject
अब सत्रह ऋचावाले बावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में किस से अधिक सुख होता है, इस विषय को कहते हैं ॥