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Rigveda Mandal 6 / Sukta 51 / Mantra 2

75 Sukta
16 Mantra
6/51/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वेद॒ यस्त्रीणि॑ वि॒दथा॑न्येषां दे॒वानां॒ जन्म॑ सनु॒तरा च॒ विप्रः॑। ऋ॒जु मर्ते॑षु वृजि॒ना च॒ पश्य॑न्न॒भि च॑ष्टे॒ सूरो॑ अ॒र्य एवा॑न् ॥२॥

वेद॑ । यः । त्रीणि॑ । वि॒दथा॑नि । ए॒षा॒म् । दे॒वाना॑म् । जन्म॑ । स॒नु॒तः । आ । च॒ । विप्रः॑ । ऋ॒जु । मर्ते॑षु । वृ॒जि॒ना । च॒ । पश्य॑न् । अ॒भि । च॒ष्टे॒ । सूरः॑ । अ॒र्यः । एवा॑न् ॥

Mantra without Swara
वेद यस्त्रीणि विदथान्येषां देवानां जन्म सनुतरा च विप्रः। ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्नभि चष्टे सूरो अर्य एवान् ॥

वेद। यः। त्रीणि। विदथानि। एषाम्। देवानाम्। जन्म। सनुतः। आ। च। विप्रः। ऋजु। मर्तेषु। वृजिना। च। पश्यन्। अभि। चष्टे। सूरः। अर्यः। एवान् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (अर्यः) स्वामी (विप्रः) बुद्धिमान् (सूरः) सूर्य के समान (एवान्) प्राप्त होने योग्य पदार्थों के तुल्य (एषाम्) इन (देवानाम्) विद्वानों के (सनुतः) सर्वदा (जन्म) उत्पन्न होनेवाला (त्रीणि) तीन (विदथानि) जानने के योग्य कर्म, उपासना और ज्ञानों को (मर्त्तेषु) मनुष्यों में (वृजिना) बलों और (ऋजु, च) सरल व्यवहार को (पश्यन्) देखता हुआ (अभि, आ, चष्टे) सब ओर से प्रकाशित करता है, वह (च) भी इन उक्त पदार्थों को (वेद) जानता है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य मनुष्यों के विद्याजन्म को जानते हैं, वे मनुष्यों में पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को पाय सब पदार्थों के जानने योग्य होते हैं, जो कर्म उपासना और ज्ञानों को प्राप्त होते हैं, वे स्वामी होते हैं ॥२॥
Subject
फिर मेधावी जन क्या जानें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥