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Rigveda Mandal 6 / Sukta 51 / Mantra 15

75 Sukta
16 Mantra
6/51/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानव॒ इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒भिद्य॑वः। कर्ता॑ नो॒ अध्व॒न्ना सु॒गं गो॒पा अ॒मा ॥१५॥

यू॒यम् । हि । स्थ । सु॒ऽदा॒न॒वः॒ । इन्द्र॑ऽज्येष्ठाः । अ॒भिऽद्य॑वः । कर्ता॑ । नः॒ । अध्व॑न् । आ । सु॒ऽगम् । गो॒पाः । अ॒मा ॥

Mantra without Swara
यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः। कर्ता नो अध्वन्ना सुगं गोपा अमा ॥

यूयम्। हि। स्थ। सुऽदानवः। इन्द्रऽज्येष्ठाः। अभिऽद्यवः। कर्ता। नः। अध्वन्। आ। सुऽगम्। गोपाः। अमा ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे (सुदानवः) उत्तम गुणों के देनेवाले विद्वानों ! (इन्द्रज्येष्ठाः) सूर्यलोक महान् ज्येष्ठ जिन लोकों का उनके समान वर्त्तमान (अभिद्यवः) पदार्थज्ञान के भीतर प्रकाशमान (गोपाः) रक्षा करनेवाले (अध्वन्) मार्ग में (नः) हम लोगों को तथा (सुगम्) सुन्दरता से जिसमें जाते (अमा) ऐसे घर को (आ, कर्त्ता) प्रकट करो उस (हि) ही घर में (यूयम्) तुम (स्था) स्थित होओ ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य दुर्गम मार्गों को सुगम करते हैं और उत्तम घरों को बनाकर आप तथा औरों को निवास करते कराते हैं, वे ही जगत् में सुख करनेवाले होते हैं ॥१५॥
Subject
कौन इस संसार में आनन्द के देनेवाले हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

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