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Rigveda Mandal 6 / Sukta 51 / Mantra 14

75 Sukta
16 Mantra
6/51/14
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ग्रावा॑णः सोम नो॒ हि कं॑ सखित्व॒नाय॑ वाव॒शुः। ज॒ही न्य१॒॑त्रिणं॑ प॒णिं वृको॒ हि षः ॥१४॥

ग्रावा॑णः । सो॒म॒ । नः॒ । हि । क॒म् । स॒खि॒ऽत्व॒नाय॑ । वा॒व॒शुः । ज॒हि । नि । अ॒त्रिण॑म् । प॒णिम् । वृकः॑ । हि । सः ॥

Mantra without Swara
ग्रावाणः सोम नो हि कं सखित्वनाय वावशुः। जही न्य१त्रिणं पणिं वृको हि षः ॥

ग्रावाणः। सोम। नः। हि। कम्। सखिऽत्वनाय। वावशुः। जहि। नि। अत्रिणम्। पणिम्। वृकः। हि। सः ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
हे (सोम) प्रेरणा देनेवाले ! जो (ग्रावाणः) मेघों के समान (सखित्वनाय) मित्रपन के लिये (नः) हम लोगों को (हि) ही (वावशुः) चाहते हैं, वे (कम्) सुख को प्राप्त हों जो (अत्रिणम्) दूसरे का सर्वस्व हरनेवाला (पणिम्) व्यवहारकर्त्ता का संबन्ध करता है (सः, हि) वही (वृकः) चोर है, इस हेतु से इसे आप (नि, जही) निरन्तर मारो ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि धर्मात्मा विद्वान् जन धर्मिष्ठ विद्वानों के साथ मित्रता रखते हैं तो वे निरन्तर सुख को प्राप्त होकर मेघ के समान सबको बढ़ाके दुष्ट आचरण करनेवाले छलियों को शीघ्र मारते हैं ॥१४॥
Subject
फिर किससे मित्रता कर कौन दूर करने योग्य हैं, इस विषयको कहते हैं ॥

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