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Rigveda Mandal 6 / Sukta 51 / Mantra 10

75 Sukta
16 Mantra
6/51/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ते हि श्रेष्ठ॑वर्चस॒स्त उ॑ नस्ति॒रो विश्वा॑नि दुरि॒ता नय॑न्ति। सु॒क्ष॒त्रासो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निर्ऋ॒तधी॑तयो वक्म॒राज॑सत्याः ॥१०॥

ते । हि । श्रेष्ठ॑ऽवर्चसः । ते । ऊँ॒ इति॑ । नः॒ । ति॒रः । विश्वा॑नि । दुः॒ऽइ॒ता । नय॑न्ति । सु॒ऽक्ष॒त्रासः॑ । वरु॑णः । मि॒त्रः । अ॒ग्निः । ऋ॒तऽधी॑तयः । व॒क्म॒राज॑ऽसत्याः ॥

Mantra without Swara
ते हि श्रेष्ठवर्चसस्त उ नस्तिरो विश्वानि दुरिता नयन्ति। सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निर्ऋतधीतयो वक्मराजसत्याः ॥

ते। हि। श्रेष्ठऽवर्चसः। ते। ऊँ इति। नः। तिरः। विश्वानि। दुःऽइता। नयन्ति। सुऽक्षत्रासः। वरुणः। मित्रः। अग्निः। ऋतऽधीतयः। वक्मराजऽसत्याः ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (हि) जिससे (ते) वे (श्रेष्ठवर्चसः) श्रेष्ठ पढ़नेवाले (सुक्षत्रासः) उत्तम राज्य वा धनयुक्त (वरुणः) श्रेष्ठ जन (मित्रः) मित्र (अग्निः) अग्नि के समान शुद्धान्तःकरण पुरुष, इनके समान वर्त्तमान (ऋतधीतयः) सत्य के धारण करनेवाले (वक्मराजसत्याः) कहनेवाले राजाओं में सत्य के प्रतिपादन करनेवाले सज्जन (नः) हम लोगों के (विश्वानि) समस्त (दुरिता) दुष्टाचरणों को (तिरः) तिरस्कार को (नयन्ति) पहुँचाते हैं उस कारण से (उ) ही (ते) वे मान करने योग्य हैं ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिससे विद्वान् धर्मात्मा जन निष्कपटता से औरों के हित साधनेवाले, विद्यादान और उपदेश द्वारा सब दुष्ट आचरणों को निवार के सत्य आचरण में प्रवृत्त करनेवाले हैं, इसी से सत्कार करने योग्य हैं ॥१०॥
Subject
फिर कौन सत्कार करने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥