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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 8

75 Sukta
15 Mantra
6/50/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्राय॑माणो॒ हिर॑ण्यपाणिर्यज॒तो ज॑गम्यात्। यो दत्र॑वाँ उ॒षसो॒ न प्रती॑कं व्यूर्णु॒ते दा॒शुषे॒ वार्या॑णि ॥८॥

आ । नः॒ । दे॒वः । स॒वि॒ता । त्राय॑माणः । हिर॑ण्यऽपाणिः । य॒ज॒तः । ज॒ग॒म्या॒त् । यः । दत्र॑ऽवान् । उ॒षसः॑ । न । प्रती॑कम् । वि॒ऽऊ॒र्णु॒ते । दा॒शुषे॑ । वार्या॑णि ॥

Mantra without Swara
आ नो देवः सविता त्रायमाणो हिरण्यपाणिर्यजतो जगम्यात्। यो दत्रवाँ उषसो न प्रतीकं व्यूर्णुते दाशुषे वार्याणि ॥

आ। नः। देवः। सविता। त्रायमाणः। हिरण्यऽपाणिः। यजतः। जगम्यात्। यः। दत्रऽवान्। उषसः। न। प्रतीकम्। विऽऊर्णुते। दाशुषे। वार्याणि ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (दत्रवान्) दान देनेवाला (हिरण्यपाणिः) हाथ में सुवर्णादि लिये हुए और (यजतः) सङ्ग करनेवाला (देवः) दिव्यगुण, कर्म, स्वभावयुक्त (सविता) सूर्य के तुल्य (त्रायमाणः) रक्षक जन (उषसः) प्रभातवेला के (न) समान समय से (दाशुषे) देनेवाले के लिये (प्रतीकम्) प्रतीति करनेवाले पदार्थ और (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य पदार्थों को (व्यूर्णुते) आच्छादित करता है तथा (नः) हम लोगों को (आ, जगम्यात्) सब ओर से निरन्तर प्राप्त हो, उसको हम लोग सदा सुखी करें ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो दानशील प्रभातवेला के समान सुन्दर प्रकाश करनेवाले जन सब के लिये विद्या और अभयदान देते हैं, वे संसार में श्रेष्ठ गिने जाते हैं ॥८॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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