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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 7

75 Sukta
15 Mantra
6/50/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ओ॒मान॑मापो मानुषी॒रमृ॑क्तं॒ धात॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः। यू॒यं हि ष्ठा भि॒षजो॑ मा॒तृत॑मा॒ विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तो॒ जनि॑त्रीः ॥७॥

ओ॒मान॑म् । आपः । मा॒नु॒षीः॒ । अमृ॑क्तम् । धात॑ । तो॒काय॑ । तन॑याय । शम् । योः । यू॒यम् । हि । स्थ । भि॒षजः॑ । मा॒तृऽत॑माः । विश्व॑स्य । स्था॒तुः । जग॑तः । जनि॑त्रीः ॥

Mantra without Swara
ओमानमापो मानुषीरमृक्तं धात तोकाय तनयाय शं योः। यूयं हि ष्ठा भिषजो मातृतमा विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्रीः ॥

ओमानम्। आपः। मानुषीः। अमृक्तम्। धात। तोकाय। तनयाय। शम्। योः। यूयम्। हि। स्थ। भिषजः। मातृऽतमाः। विश्वस्य। स्थातुः। जगतः। जनित्रीः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (मातृतमाः) अतीव माता के समान कृपालु तथा (जनित्रीः) उत्पन्न करनेवाली (तोकाय) थोड़ी आयुवाले सन्तान वा (तनयाय) सुन्दर कुमार सन्तान के लिये (शम्) सुख करती हैं, वैसे (यूयम्) तुम (आपः) जलों के समान (अमृक्तम्) अशुद्ध जन को वा (ओमानम्) रक्षा आदि करनेवाले को और (मानुषीः) मनुष्य सम्बन्धी प्रजाओं को (धात) धारण करो तथा (स्थातुः) स्थावर वा (जगतः) जङ्गम (विश्वस्य) संसार के (हि) जिस कारण तुम (भिषजः) वैद्य (स्था) हो, वा जैसे न्यायाधीश सबको सुख (योः) पहुँचाता है, वैसे यहाँ वर्त्तो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशको ! तुम अपवित्र जन को सत्य ग्रहण कराकर शुद्ध करो तथा सब जगत् की रक्षा करने के निमित्त अविद्यारूपी रोग के निवारण करनेवाले होते हुए सब को माता के तुल्य पालो ॥७॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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