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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 5

75 Sukta
15 Mantra
6/50/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मि॒म्यक्ष॒ येषु॑ रोद॒सी नु दे॒वी सिष॑क्ति पू॒षा अ॑भ्यर्ध॒यज्वा॑। श्रु॒त्वा हवं॑ मरुतो॒ यद्ध॑ या॒थ भूमा॑ रेजन्ते॒ अध्व॑नि॒ प्रवि॑क्ते ॥५॥

मि॒म्यक्ष॑ । येषु॑ । रो॒द॒सी । नु । दे॒वी । सिस॑क्ति । पू॒षा । अ॒भ्य॒र्ध॒ऽयज्वा॑ । श्रु॒त्वा । हव॑म् । म॒रु॒तः॒ । यत् । ह॒ । या॒थ । भूम॑ । रे॒ज॒न्ते॒ । अध्व॑नि । प्रऽवि॑क्ते ॥

Mantra without Swara
मिम्यक्ष येषु रोदसी नु देवी सिषक्ति पूषा अभ्यर्धयज्वा। श्रुत्वा हवं मरुतो यद्ध याथ भूमा रेजन्ते अध्वनि प्रविक्ते ॥

मिम्यक्ष। येषु। रोदसी। नु। देवी। सिसक्ति। पूषा। अभ्यर्धऽयज्वा। श्रुत्वा। हवम्। मरुतः। यत्। ह। याथ। भूम। रेजन्ते। अध्वनि। प्रऽविक्ते ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) मनुष्यो ! (येषु) जिन वायु आदि पदार्थों में (रोदसी) प्रकाश और भूमि (देवी) जोकि दिव्यगुणवाली हैं उनको (अभ्यर्धयज्वा) मुख्य के आधे में सङ्गत होनेवाला (पूषा) पुष्टि करनेवाला मेघ (सिषक्ति) सींचता है आप इससे (नु) शीघ्र (मिम्यक्ष) शीघ्र जाइये (यत्) जो (ह) निश्चय कर (भूमा) भूमि में वा (प्रविक्ते) प्रकर्षकर चलने योग्य (अध्वनि) मार्ग में (रेजन्ते) काँपते वा जाते हैं उनके (हवम्) शब्द को (श्रुत्वा) सुनकर उनको तुम (याथ) प्राप्त होओ ॥५॥
Essence
हे विद्वानो ! तुम सूर्य्य और पृथिवी के तुल्य प्रकाश और क्षमाशील होकर सबके प्रश्नों को सुनकर समाधान देओ, जैसे भूमि आदि लोक अपने-अपने मार्ग में नियम से जाते हैं, वैसे नियम से धर्ममार्ग में जाओ ॥५॥
Subject
फिर विद्वान् जनों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥