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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 3

75 Sukta
15 Mantra
6/50/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त द्या॑वापृथिवी क्ष॒त्रमु॒रु बृ॒हद्रो॑दसी शर॒णं सु॑षुम्ने। म॒हस्क॑रथो॒ वरि॑वो॒ यथा॑ नो॒ऽस्मे क्षया॑य धिषणे अने॒हः ॥३॥

उ॒त । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । क्ष॒त्रम् । उ॒रु । बृ॒हत् । रो॒द॒सी॒ इति॑ । श॒र॒णम् । सु॒सु॒म्ने॒ इति॑ सुऽसुम्ने । म॒हः । क॒र॒थः॒ । वरि॑वः । यथा॑ । नः॒ । अ॒स्मे इति॑ । क्षया॑य । धि॒ष॒णे॒ इति॑ । अ॒ने॒हः ॥

Mantra without Swara
उत द्यावापृथिवी क्षत्रमुरु बृहद्रोदसी शरणं सुषुम्ने। महस्करथो वरिवो यथा नोऽस्मे क्षयाय धिषणे अनेहः ॥

उत। द्यावापृथिवी इति। क्षत्रम्। उरु। बृहत्। रोदसी इति। शरणम्। सुसुम्ने इति सुऽसुम्ने। महः। करथः। वरिवः। यथा। नः। अस्मे इति। क्षयाय। धिषणे इति। अनेहः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको ! तुम (यथा) जैसे (रोदसी) बहुत कार्य और (सुषुम्ने) सुन्दर सुख करनेवाली (धिषणे) व्यवहारों को धारण करनेवाली (द्यावापृथिवी) बिजुली और भूमि (नः) हमारे (उरु) बहुत (बृहत्) महान् (शरणम्) आश्रय और (क्षत्रम्) धन राज्य वा क्षत्रियकुल को सिद्ध करते हैं, वैसे (महः) बड़े (वरिवः) सेवन (उत) और (अनेहः) न नष्ट करने योग्य व्यवहार (अस्मे) हम लोगों में (क्षयाय) निवास करने के लिये (करथः) सिद्ध करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अध्यापन और उपदेश करनेवाले जन सूर्य और भूमि के तुल्य सब को विद्यादान, धारण और शरण देते हैं तथा जो सत्य, यथार्थवक्ता और विद्वानों की सेवा करते हैं, वे सर्वथा माननीय होते हैं ॥३॥
Subject
फिर विद्वान् जन किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥