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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 15

75 Sukta
15 Mantra
6/50/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वा नपा॑तो॒ मम॒ तस्य॑ धी॒भिर्भ॒रद्वा॑जा अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः। ग्ना हु॒तासो॒ वस॒वोऽधृ॑ष्टा॒ विश्वे॑ स्तु॒तासो॑ भूता यजत्राः ॥१५॥

ए॒व । नपा॑तः । मम॑ । तस्य॑ । धी॒भिः । भ॒रत्ऽवा॑जाः । अ॒भि । अ॒र्च॒न्ति॒ । अ॒र्कैः । ग्नाः । हु॒तासः॑ । वस॑वः । अधृ॑ष्टाः । विश्वे॑ । स्तु॒तासः॑ । भू॒त॒ । य॒ज॒त्राः॒ ॥

Mantra without Swara
एवा नपातो मम तस्य धीभिर्भरद्वाजा अभ्यर्चन्त्यर्कैः। ग्ना हुतासो वसवोऽधृष्टा विश्वे स्तुतासो भूता यजत्राः ॥

एव। नपातः। मम। तस्य। धीभिः। भरत्ऽवाजाः। अभि। अर्चन्ति। अर्कैः। ग्नाः। हुतासः। वसवः। अधृष्टाः। विश्वे। स्तुतासः। भूत। यजत्राः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यजत्राः) सङ्ग करने वालो ! जैसे (मम) मेरी और (तस्य) उसकी (धीभिः) बुद्धि वा कर्मों से (भरद्वाजाः) धारण किया है विज्ञान जिन्होंने वे सज्जन और (नपातः) पातरहित (हुतासः) सत्कार से ग्रहण किये हुए (स्तुतासः) प्रशंसा को प्राप्त (विश्वे) सब विद्वान् मेरी और उसकी बुद्धि वा कर्मों से (अर्कैः) विचारों से (ग्नाः) वाणियों को (अभि, अर्चन्ति) सब ओर से सत्कृत करते हैं, वैसे (एवा) ही (अधृष्टाः) धृष्टतारहित (वसवः) विद्यादिकों में बसनेवाले तुम (भूत) होओ ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्यार्थी विद्या और प्रगल्भता की इच्छा करते हैं, वे यथार्थवक्ता तथा ईश्वर के गुण कर्म और स्वभावों को धारण कर इष्ट मति और विद्या को प्राप्त होते हैं ॥१५॥ इस सूक्त में विश्वे देवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पचासवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर जिज्ञासु जन कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥