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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 13

75 Sukta
15 Mantra
6/50/13
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त स्य दे॒वः स॑वि॒ता भगो॑ नो॒ऽपां नपा॑दवतु॒ दानु॒ पप्रिः॑। त्वष्टा॑ दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः स॒जोषा॒ द्यौर्दे॒वेभिः॑ पृथि॒वी स॑मु॒द्रैः ॥१३॥

उ॒त । स्यः । दे॒वः । स॒वि॒ता । भगः॑ । नः॒ । अ॒पाम् । नपा॑त् । अ॒व॒तु॒ । दानु॑ । पप्रिः॑ । त्वष्टा॑ । दे॒वेभिः॑ । जनि॑ऽभिः । स॒ऽजोषाः॑ । द्यौः । दे॒वेभिः॑ । पृ॒थि॒वी । स॒मु॒द्रैः ॥

Mantra without Swara
उत स्य देवः सविता भगो नोऽपां नपादवतु दानु पप्रिः। त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः सजोषा द्यौर्देवेभिः पृथिवी समुद्रैः ॥

उत। स्यः। देवः। सविता। भगः। नः। अपाम्। नपात्। अवतु। दानु। पप्रिः। त्वष्टा। देवेभिः। जनिऽभिः। सऽजोषाः। द्यौः। देवेभिः। पृथिवी। समुद्रैः ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! आप जैसे (स्यः) वह (देवः) देदीप्यमान (सविता) उत्पत्ति करनेवाला सूर्य (भगः) सेवने योग्य प्राण (उत) और (अपाम्) जलों के बीच (नपात्) न गिरनेवाला विद्युत् रूप अग्नि तथा (देवेभिः) दिव्य गुणों के और (जनिभिः) जन्म वा जन्म देनेवालों के साथ (त्वष्टा) छिन्न-भिन्नकर्त्ता (सजोषाः) समान प्रीति का सेवनेवाला (देवेभिः) सूर्यादि वा दिव्य पदार्थों के साथ (द्यौः) सूर्य (समुद्रैः) समुद्रों के साथ (पृथिवी) भूमि (दानु) दान को (पप्रिः) पूर्ण करते हुए (नः) हम लोगों की (अवतु) रक्षा करे ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे ईश्वर से रचे हुए सूर्यादि पदार्थ सब मनुष्य आदि प्राणियों के कार्यसिद्धि के निमित्त हैं, वैसे आप लोग भी सब की कार्यसिद्धि करनेवाले हों ॥१३॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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