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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 12

75 Sukta
15 Mantra
6/50/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ते नो॑ रु॒द्रः सर॑स्वती स॒जोषा॑ मी॒ळ्हुष्म॑न्तो॒ विष्णु॑र्मृळन्तु वा॒युः। ऋ॒भु॒क्षा वाजो॒ दैव्यो॑ विधा॒ता प॒र्जन्या॒वाता॑ पिप्यता॒मिषं॑ नः ॥१२॥

ते । नः॒ । रु॒द्रः । सर॑स्वती । स॒ऽजोषाः॑ । मी॒ळ्हुष्म॑न्तः । विष्णुः॑ । मृ॒ळ॒न्तु॒ । वा॒युः । ऋ॒भु॒क्षाः । वाजः॑ । दैव्यः॑ । वि॒ऽधा॒ता । प॒र्जन्या॒वाता॑ । पि॒प्य॒ता॒म् । इष॑म् । नः॒ ॥

Mantra without Swara
ते नो रुद्रः सरस्वती सजोषा मीळ्हुष्मन्तो विष्णुर्मृळन्तु वायुः। ऋभुक्षा वाजो दैव्यो विधाता पर्जन्यावाता पिप्यतामिषं नः ॥

ते। नः। रुद्रः। सरस्वती। सऽजोषाः। मीळ्हुष्मन्तः। विष्णुः। मृळन्तु। वायुः। ऋभुक्षाः। वाजः। दैव्यः। विऽधाता। पर्जन्यावाता। पिप्यताम्। इषम्। नः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 2

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Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको ! (सरस्वती) बहुत विज्ञानयुक्त (सजोषाः) समान प्रीति सेवनेवाले (पर्जन्यावाता) मेघ और वात के समान आप दोनों जैसे (ते) वे अर्थात् (रुद्रः) दुष्टों को रुलानेवाला (विष्णुः) व्यापक अग्नि (वायुः) पवन (ऋभुक्षाः) मेधावी जन (वाजः) अन्न (दैव्यः) विद्वानों से किया हुआ व्यवहार और (विधाता) विधान करनेवाला ये सब (मीळ्हुष्मन्तः) बहुत वीर्य सेचक आदि गुणोंवाले होते हुए (नः) हम लोगों को (मृळन्तु) सुखी करें, वैसे (नः) हम लोगों के लिये (इषम्) अन्नादि पदार्थों को (पिप्यताम्) ब़ढ़ाओ ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर से निर्मित किये हुए पृथिवी आदि पदार्थ प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे ही तुम विद्यादान से सब को सुखी करो ॥१२॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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