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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 10

75 Sukta
15 Mantra
6/50/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त त्या मे॒ हव॒मा ज॑ग्म्यातं॒ नास॑त्या धी॒भिर्यु॒वम॒ङ्ग वि॑प्रा। अत्रिं॒ न म॒हस्तम॑सोऽमुमुक्तं॒ तूर्व॑तं नरा दुरि॒ताद॒भीके॑ ॥१०॥

उ॒त । त्या । मे॒ । हव॑म् । आ । ज॒ग्म्या॒त॒म् । नास॑त्या । धी॒भिः । यु॒वम् । अ॒ङ्ग । वि॒प्रा॒ । अत्रि॑म् । न । म॒हः । तम॑सः । अ॒मु॒मु॒क्त॒म् । तूर्व॑तम् । न॒रा॒ । दुः॒ऽइ॒तात् । अ॒भीके॑ ॥

Mantra without Swara
उत त्या मे हवमा जग्म्यातं नासत्या धीभिर्युवमङ्ग विप्रा। अत्रिं न महस्तमसोऽमुमुक्तं तूर्वतं नरा दुरितादभीके ॥

उत। त्या। मे। हवम्। आ। जग्म्यातम्। नासत्या। धीभिः। युवम्। अङ्ग। विप्रा। अत्रिम्। न। महः। तमसः। अमुमुक्तम्। तूर्वतम्। नरा। दुःऽइतात्। अभीके ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अङ्ग) मित्र ! (नासत्या) सत्य आचरण करनेवाले (विप्रा) मेधावी अध्यापक और उपदेशक (नरा) नायक सब में श्रेष्ठजन (त्या) वे (युवम्) तुम दोनों (धीभिः) उत्तम बुद्धि वा कर्मों से (मे) मेरे (अभीके) समीप में (हवम्) लेने योग्य पदार्थ को (आ, जग्म्यातम्) सब ओर से प्राप्त होओ (उत) और जैसे (महः) महान् (तमसः) अन्धकार से (अत्रिम्) सूर्य को (न) वैसे (दुरितात्) अधर्माचरण से (अमुमुक्तम्) छुड़ाओ और दुर्गुणों को (तूर्वतम्) नष्ट करो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्योदय को प्राप्त होकर सब पदार्थ अन्धकार से छूट जाते हैं, वैसे धार्मिक विद्वान् को प्राप्त होकर अविद्या से मनुष्य मुक्त होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को किनके सङ्ग से कैसा होना योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥