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Rigveda Mandal 6 / Sukta 49 / Mantra 5

75 Sukta
15 Mantra
6/49/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स मे॒ वपु॑श्छदयद॒श्विनो॒र्यो रथो॑ वि॒रुक्मा॒न्मन॑सा युजा॒नः। येन॑ नरा नासत्येष॒यध्यै॑ व॒र्तिर्या॒थस्तन॑याय॒ त्मने॑ च ॥५॥

सः । मे॒ । वपुः॑ । छ॒द॒य॒त् । अ॒श्विनोः॑ । यः । रथः॑ । वि॒रुक्मा॑न् । मन॑सा । यु॒जा॒नः । येन॑ । न॒रा॒ । ना॒स॒त्या॒ । इ॒ष॒यध्यै॑ । व॒र्तिः । या॒थः । तन॑याय । त्मने॑ । च॒ ॥

Mantra without Swara
स मे वपुश्छदयदश्विनोर्यो रथो विरुक्मान्मनसा युजानः। येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तिर्याथस्तनयाय त्मने च ॥

सः। मे। वपुः। छदयत्। अश्विनोः। यः। रथः। विरुक्मान्। मनसा। युजानः। येन। नरा। नासत्या। इषयध्यै। वर्तिः। याथः। तनयाय। त्मने। च ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (यः) जो (अश्विनोः) प्राण और अपान के (विरुक्मान्) विविधदीप्तियुक्त (मनसा) अन्तःकरण से (युजानः) युक्त होता हुआ (रथः) रमणीय व्यवहार (मे) मेरे (वपुः) शरीर वा रूप को (छदयत्) बली करता है तथा (येन) जिससे (तनयाय) सन्तान के लिये (त्मने, च) और अपने लिये (नरा) नायक अग्रगामी (नासत्या) जिनके असत्य विद्यमान नहीं वे अध्यापक और उपदेशक योगीजन (इषयध्यै) चलने के लिये जो (वर्त्तिः) मार्ग है उसको (याथः) प्राप्त होते हैं (सः) वह तुम लोगों को चाहिये कि जानकर अन्तःकरण से आत्मा में निरन्तर यत्न =युक्त करने योग्य हो ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस वायु से योगीजन विविध प्रकार के विज्ञान को प्राप्त होते हैं तथा जिससे सब जगत् वा सब प्राणी जीते हैं, उसके अभ्यास से परमात्मा को जान कर मुक्ति-पथ से आनन्द को प्राप्त होओ ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य किससे किसको प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥