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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 7

75 Sukta
22 Mantra
6/48/7
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभिः॑ शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑। भ॒रद्वा॑जे समिधा॒नो य॑विष्ठ्य रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि ॥७॥

बृ॒हत्ऽभिः॑ । अ॒ग्ने॒ । अ॒र्चिऽभिः॑ । शु॒क्रेण॑ । दे॒व॒ । शो॒चिषा॑ । भ॒रत्ऽवा॑जे । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । य॒वि॒ष्ठ्य॒ । रे॒वत् । नः॒ । शु॒क्र॒ । दी॒दि॒हि॒ । द्यु॒ऽमत् । पा॒व॒क॒ । दी॒दि॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा। भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥

बृहत्ऽभिः। अग्ने। अर्चिऽभिः। शुक्रेण। देव। शोचिषा। भरत्ऽवाजे। सम्ऽइधानः। यविष्ठ्य। रेवत्। नः। शुक्र। दीदिहि। द्युऽमत्। पावक। दीदिहि ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शुक्र) शीघ्र कर्म करने (पावक) वा पवित्र करने (यविष्ठ्य) वा अतीव युवा अवस्था रखने वा (देव) देनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वन् ! जैसे अग्नि (बृहद्भिः) महान् (अर्चिभिः) तेजों से (भरद्वाजे) विज्ञानादि के धारण करनेवाले व्यवहार में (समिधानः) अच्छे प्रकार देदीप्यमान (नः) हमारे लिये (द्युमत्) प्रशस्त प्रकाश वा (रेवत्) प्रशस्त ऐश्वर्य्य से युक्त धन को देता है, वैसे (शुक्रेण) शुद्ध (शोचिषा) न्याय के प्रकाश से उसे (दीदिहि) प्रकाशित कीजिये, तथा विद्या और नम्रता (दीदिहि) दीजिये ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सूर्य के समान शुभ गुणों में बल वा सुशीलता से लक्ष्मी को प्राप्त होकर प्रकाशित होते हैं, वे सत्कार करने योग्य हैं ॥७॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥