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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 19

75 Sukta
22 Mantra
6/48/19
Devata- पूषा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प॒रो हि मर्त्यै॒रसि॑ स॒मो दे॒वैरु॒त श्रि॒या। अ॒भि ख्यः॑ पूष॒न्पृत॑नासु न॒स्त्वमवा॑ नू॒नं यथा॑ पु॒रा ॥१९॥

प॒रः । हि । मर्त्यैः॑ । असि॑ । स॒मः । दे॒वैः । उ॒त । श्रि॒या । अ॒भि । ख्यः॒ । पू॒ष॒न् । पृत॑नासु । नः॒ । त्वम् । अव॑ । नू॒नम् । यथा॑ । पु॒रा ॥

Mantra without Swara
परो हि मर्त्यैरसि समो देवैरुत श्रिया। अभि ख्यः पूषन्पृतनासु नस्त्वमवा नूनं यथा पुरा ॥

परः। हि। मर्त्यैः। असि। समः। देवैः। उत। श्रिया। अभि। ख्यः। पूषन्। पृतनासु। नः। त्वम्। अव। नूनम्। यथा। पुरा ॥१९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 3

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Meaning
हे (पूषन्) पुष्टि करनेवाले ! (यथा) जैसे (हि) जिस कारण (पुरा) पहिले (त्वम्) आप (नः) हमारी (पृतनासु) मनुष्य सेनाओं में (अभि, ख्यः) सब ओर से अच्छे प्रकार कथन करते हैं, वैसे (नूनम्) निश्चित (मर्त्यैः) साधारण मनुष्य वा (देवैः) विद्वान् (उत) और (श्रिया) लक्ष्मी के साथ (परः) उत्कृष्ट अत्युत्तम वा (समः) समान (असि) हैं इससे (अवा) रक्षा कीजिये ॥१९॥
Essence
जो विद्वानों के तुल्य है वह विद्वान्, जो मनुष्यों के तुल्य है वह मध्यम, और जो पशुओं के तुल्य है वह अधम मनुष्य है, इसको सब जानें ॥१९॥
Subject
मनुष्यों को कैसा होना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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