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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 17

75 Sukta
22 Mantra
6/48/17
Devata- पूषा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
म का॑क॒म्बीर॒मुद्वृ॑हो॒ वन॒स्पति॒मश॑स्ती॒र्वि हि नीन॑शः। मोत सूरो॒ अह॑ ए॒वा च॒न ग्री॒वा आ॒दध॑ते॒ वेः ॥१७॥

मा । का॒क॒म्बीर॑म् । उत् । वृ॒हः॒ । वन॒स्पति॑म् । अश॑स्तीः । वि । हि । नीन॑शः । मा । उ॒त । सूरः॑ । अह॒रिति॑ । ए॒व । च॒न । ग्री॒वा । आ॒ऽदध॑ते । वेः ॥

Mantra without Swara
म काकम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिमशस्तीर्वि हि नीनशः। मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा आदधते वेः ॥

मा। काकम्बीरम्। उत्। वृहः। वनस्पतिम्। अशस्तीः। वि। हि। नीनशः। मा। उत। सूरः। अहरिति। एव। चन। ग्रीवा। आऽदधते। वेः ॥१७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप (काकंबीरम्) कौओं की पुष्टि करनेवाले (वनस्पतिम्) वट आदि वृक्ष को (मा, उत, वृहः) मत उच्छिन्न करो तथा (अशस्तीः) और अप्रशंसित (हि) ही कर्मों की (वि, नीनशः) विशेषता से निरन्तर नाश करो और (सूरः) सूर्य (अहः, एवा) दिन में ही जैसे (वेः) पक्षी के (ग्रीवाः) कण्ठों को (चन) निश्चय से (आदधते) अच्छे प्रकार धारण करते हैं, वैसे (उत) तो हम लोगों को (मा) मत पीड़ा देओ ॥१७॥
Essence
किसी मनुष्य को श्रेष्ठ वृक्ष वा वनस्पति न नष्ट करने चाहियें, किन्तु इनमें जो दोष हों, उनको निवारण करके इन्हें उत्तम सिद्ध करने चाहियें, हे मनुष्य ! जैसे श्येन वाज पक्षी और पखेरूओं की गर्दनें पकड़ घोटता है, वैसे किसी को दुःख न देओ ॥१७॥
Subject
मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥