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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 14

75 Sukta
22 Mantra
6/48/14
Devata- मरुतो लिङ्गोक्ता वा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
तं व॒ इन्द्रं॒ न सु॒क्रतुं॒ वरु॑णमिव मा॒यिन॑म्। अ॒र्य॒मणं॒ न म॒न्द्रं सृ॒प्रभो॑जसं॒ विष्णुं॒ न स्तु॑ष आ॒दिशे॑ ॥१४॥

तम् । वः॒ । इन्द्र॑म् । न । सु॒ऽक्रतु॑म् । वरु॑णम्ऽइव । मा॒यिन॑म् । अ॒र्य॒मण॑म् । न । म॒न्द्रम् । सृ॒प्रऽभो॑जसम् । विष्णु॑म् । न । स्तु॒षे॒ । आ॒ऽदिशे॑ ॥

Mantra without Swara
तं व इन्द्रं न सुक्रतुं वरुणमिव मायिनम्। अर्यमणं न मन्द्रं सृप्रभोजसं विष्णुं न स्तुष आदिशे ॥

तम्। वः। इन्द्रम्। न। सुऽक्रतुम्। वरुणम्ऽइव। मायिनम्। अर्यमणम्। न। मन्द्रम्। सृप्रऽभोजसम्। विष्णुम्। न। स्तुषे। आऽदिशे ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप जिस इस (इन्द्रम्) बिजुली के समान तीव्रबुद्धि के (न) समान (सुक्रतुम्) उत्तम बुद्धिवाले (वरुणस्य) वरुण के समान (मायिनम्) कुत्सित बुद्धिवाले वा (अर्यमणम्) न्यायाधिपति के (न) समान (मन्द्रम्) आनन्द देनेवाले (विष्णुम्) व्यापक जगदीश्वर के (न) समान (सृप्रभोजसम्) प्राप्त हुए पदार्थों के पालने की (स्तुषे) प्रशंसा करते हैं (तम्) उसको (वः) तुम लोगों के लिये (आदिशे) आज्ञा पालन के अर्थ मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के समान विद्याप्रकाशक, व्याध के समान दुष्टों के मारनेवाले, आप्त विद्वान् के समान न्याय के करनेवाले, ईश्वर के समान सर्व के पालनेवाले, सत्य के उपदेश करनेवाले तथा धर्म करनेवाले मनुष्य की प्रशंसा करते हैं, वे ही इस संसार में परीक्षा करनेवाले होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर मनुष्य किसकी प्रशंसा करें, इस विषय को कहते हैं ॥