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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 12

75 Sukta
22 Mantra
6/48/12
Devata- मरुतः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
या शर्धा॑य॒ मारु॑ताय॒ स्वभा॑नवे॒ श्रवोऽमृ॑त्यु॒ धुक्ष॑त। या मृ॑ळी॒के म॒रुतां॑ तु॒राणां॒ या सु॒म्नैरे॑व॒याव॑री ॥१२॥

या । शर्धा॑य । मारु॑ताय । स्वऽभा॑नवे । श्रवः॑ । अमृ॑त्यु । धुक्ष॑त । या । मृ॒ळी॒के । म॒रुता॑म् । तु॒राणा॑म् । या । सु॒म्नैः । ए॒व॒ऽयाव॑री ॥

Mantra without Swara
या शर्धाय मारुताय स्वभानवे श्रवोऽमृत्यु धुक्षत। या मृळीके मरुतां तुराणां या सुम्नैरेवयावरी ॥

या। शर्धाय। मारुताय। स्वऽभानवे। श्रवः। अमृत्यु। धुक्षत। या। मृळीके। मरुताम्। तुराणाम्। या। सुम्नैः। एवऽयावरी ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! (या) जो विद्या और सुन्दरशिक्षायुक्त विद्या पढ़ाने वा उपदेश करनेवाली (मारुताय) मनुष्यों के इस (स्वभानवे) अपनी विशेष बुद्धि के प्रकाश वा (शर्धाय) बल के लिये (अमृत्यु) जिसमें मृत्युभय विद्यमान नहीं उस (श्रवः) श्रवण को (धुक्षत) परिपूर्ण करे वा (या) जो विदुषी स्त्री (मृळीके) सुख करनेवाले व्यवहार में (तुराणाम्) शीघ्रकारी (मरुताम्) मनुष्यों के बीच मृत्युभय जिसमें नहीं उस श्रवण को परिपूर्ण करे तथा (सुम्नैः) सुखों से (या) जो शिक्षा करने वा (एवयावरी) दुःख निवारणवाली सन्तानों की शिक्षा करती है, वही यहाँ मानने योग्य होती है ॥१२॥
Essence
वे ही स्त्रियाँ धन्य हैं, जो अपने सन्तानों को विद्या और सुन्दर शिक्षायुक्त करने व कराने को निरन्तर प्रयत्न करती हैं ॥१२॥
Subject
अब माता जन सन्तानों को सदा शिक्षा देवें, इस विषय को कहते हैं ॥