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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 11

75 Sukta
22 Mantra
6/48/11
Devata- मरुतः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
आ स॑खायः सब॒र्दुघां॑ धे॒नुम॑जध्व॒मुप॒ नव्य॑सा॒ वचः॑। सृ॒जध्व॒मन॑पस्फुराम् ॥११॥

आ । स॒खा॒यः॒ । स॒बः॒ऽदुघा॑म् । धे॒नुम् । अ॒ज॒ध्व॒म् । उप॑ । नव्य॑सा । वचः॑ । सृ॒जध्व॑म् । अन॑पऽस्फुराम् ॥

Mantra without Swara
आ सखायः सबर्दुघां धेनुमजध्वमुप नव्यसा वचः। सृजध्वमनपस्फुराम् ॥

आ। सखायः। सबःऽदुघाम्। धेनुम्। अजध्वम्। उप। नव्यसा। वचः। सृजध्वम्। अनपऽस्फुराम् ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सखायः) मित्रवर्गो ! तुम (नव्यसा) अतीव नवीन पढ़ाने वा उपदेश करने से (सबर्दुघाम्) समस्त कामनाओं की पूर्ण करनेवाली (अनपस्फुराम्) निश्चल दृढ़ (धेनुम्) वाणी को (अजध्वम्) प्राप्त करिये तथा (वचः) अर्थात् वचन को (उप, आ, सृजध्वम्) विविध प्रकार की विद्या से युक्त करो ॥११॥
Essence
जो सुहृद् होकर सत्य, सुन्दर शिक्षायुक्त वाणी और विद्या को विद्यार्थियों को ग्रहण कराते हैं, वे संसार के शुद्ध करनेवाले होते हैं ॥११॥
Subject
कौन इस संसार में मित्र हैं, इस विषय को कहते हैं ॥