Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 10

75 Sukta
22 Mantra
6/48/10
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पर्षि॑ तो॒कं तन॑यं प॒र्तृभि॒ष्ट्वमद॑ब्धै॒रप्र॑युत्वभिः। अग्ने॒ हेळां॑सि॒ दैव्या॑ युयोधि॒ नोऽदे॑वानि॒ ह्वरां॑सि च ॥१०॥

पर्षि॑ । तो॒कम् । तन॑यम् । प॒र्तृऽभिः॑ । त्वम् । अद॑ब्धैः । अप्र॑युत्वऽभिः । अग्ने॑ । हेलां॑सि । दैव्या॑ । यु॒यो॒धि॒ । नः॒ । अदे॑वानि । ह्वरां॑सि । च॒ ॥

Mantra without Swara
पर्षि तोकं तनयं पर्तृभिष्ट्वमदब्धैरप्रयुत्वभिः। अग्ने हेळांसि दैव्या युयोधि नोऽदेवानि ह्वरांसि च ॥

पर्षि। तोकम्। तनयम्। पर्तृऽभिः। त्वम्। अदब्धैः। अप्रयुत्वऽभिः। अग्ने। हेलांसि। दैव्या। युयोधि। नः। अदेवानि। ह्वरांसि। च ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) पढ़ानेवाला ! जिस कारण (त्वम्) आप (अप्रयुत्वभिः) न मिले हुए अर्थात् अलग-अलग विद्यमान (अदब्धैः) हिंसारहित (पर्तृभिः) पालना करनेवाले व्यवहारों से (नः) हमारे (तोकम्) शीघ्र उत्पन्न हुए सन्तान वा (तनयम्) सुन्दर कुमार की (पर्षि) पालना करते हो और (अदेवानि) अशुद्ध (दैव्या) विद्वानों में कहे गये (हेळांसि) अनादरों और (ह्वरांसि) कुटिल कर्मों को (च) भी (युयोधि) अलग करते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१०॥
Essence
जो अध्यापक वा उपदेशक पढ़ाने तथा उपदेश करने से शुभ गुणों को ग्रहण करा कर सब के दोषों का निवारण कराते हैं, वे ही सदा सत्कार करने योग्य होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को कौन सत्कार करने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥