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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 8

75 Sukta
31 Mantra
6/47/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒रुं नो॑ लो॒कमनु॑ नेषि वि॒द्वान्त्स्व॑र्व॒ज्ज्योति॒रभ॑यं स्व॒स्ति। ऋ॒ष्वा त॑ इन्द्र॒ स्थवि॑रस्य बा॒हू उप॑ स्थेयाम शर॒णा बृ॒हन्ता॑ ॥८॥

उ॒रुम् । नः॒ । लो॒कम् । अनु॑ । ने॒षि॒ । वि॒द्वान् । स्व॑र्ऽवत् । ज्योतिः॑ । अभ॑यम् । स्व॒स्ति । ऋ॒ष्वा । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । स्थवि॑रस्य । बा॒हू इति॑ । उप॑ । स्थे॒या॒म॒ । श॒र॒णा । बृ॒हन्ता॑ ॥

Mantra without Swara
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति। ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणा बृहन्ता ॥

उरुम्। नः। लोकम्। अनु। नेषि। विद्वान्। स्वर्ऽवत्। ज्योतिः। अभयम्। स्वस्ति। ऋष्वा। ते। इन्द्र। स्थविरस्य। बाहू इति। उप। स्थेयाम। शरणा। बृहन्ता ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 31 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) न्याय को प्राप्त करानेवाले राजन् ! जिस (स्थविरस्य) विद्या और विनय से वृद्ध (ते) आपके (शरणा) शत्रुओं के नाश करनेवाले (बृहन्ता) बड़े (ऋष्वौ) श्रेष्ठ (बाहू) बल और वीर्य्य से युक्त भुजाओं को हम लोग (उप, स्थेयाम) प्राप्त होवें वह (विद्वान्) विद्वान् आप जिससे (नः) हम लोगों को (उरुम्) बहुत (स्वर्वत्) अत्यन्त सुख से युक्त (ज्योतिः) ज्ञान का प्रकाश और (अभयम्) भय से रहित (स्वस्ति) सुख (लोकम्) दर्शन वा वृद्धि को (अनु, नेषि) प्राप्त कराते हो, इससे हम लोगों से आदर करने योग्य हो ॥८॥
Essence
राजा बड़े प्रयत्न से अपने आधीन प्रजाओं को विद्या और अभय सुख से युक्त करे, जिससे सब प्रजा अनुकूल होवें ॥८॥
Subject
राजा अपने आश्रितों के प्रति कैसा वर्त्ताव करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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