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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 31

75 Sukta
31 Mantra
6/47/31
Devata- दुन्दुभिरिन्द्रश्च Rishi- गर्गः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आमूर॑ज प्र॒त्याव॑र्तये॒माः के॑तु॒मद्दु॑न्दु॒भिर्वा॑वदीति। समश्व॑पर्णा॒श्चर॑न्ति नो॒ नरो॒ऽस्माक॑मिन्द्र र॒थिनो॑ जयन्तु ॥३१॥

आ । अ॒मूः । अ॒ज॒ । प्र॒ति॒ऽआव॑र्तय । इ॒माः । के॒तु॒ऽमत् । दु॒न्दु॒भिः । वा॒व॒दी॒ति॒ । सम् । अश्व॑ऽपर्णाः । चर॑न्ति । नः॒ । नरः॑ । अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्र॒ । र॒थिनः॑ । ज॒य॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वावदीति। समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु ॥

आ। अमूः। अज। प्रतिऽआवर्तय। इमाः। केतुऽमत्। दुन्दुभिः। वावदीति। सम्। अश्वऽपर्णाः। चरन्ति। नः। नरः। अस्माकम्। इन्द्र। रथिनः। जयन्तु ॥३१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 35 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करनेवाले राजन् ! आप जैसे (दुन्दुभिः) नगाड़ा (केतुमत्) प्रशंसा योग्य बुद्धियुक्त (वावदीति) निरन्तर बजाता, वैसे (इमाः) यह (अश्वपर्णाः) महान् पक्षोंवाली अपनी सेनाएँ (प्रत्यावर्त्तय) लौटाइये और उनसे (अमूः) यह शत्रुसेनाएँ दूर (आ, अज) फेंकिये जो (अस्माकम्) हमारे (रथिनः) प्रशंसित रथवाले (नरः) नायक वीर हमारे शत्रुओं को (जयन्तु) जीतें और जो विजय के लिये (सम्, चरन्ति) सम्यक् विचरते हैं, वे (नः) हम लोगों को सुशोभित करें ॥३१॥
Essence
हे राजा आदि जनो ! तुम लोग दुन्दुभि आदि वाजनों से भूषित, हर्ष वा पुष्टि से युक्त सेनाओं को अच्छे प्रकार रख कर इनसे दूरस्थ भी शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीतकर प्रजाओं को धर्मयुक्त व्यवहार से पालन करो ॥३१॥ इस सूक्त में सोम, प्रश्नोत्तर, बिजुली, राजा, प्रजा, सेना और वाजनों से भूषित कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ इस अध्याय में इन्द्र, सोम, ईश्वर, राजा, प्रजा, मेघ, सूर्य, वीर, सेना, यान, यज्ञ, मित्र, ऐश्वर्य्य, प्रज्ञा, बिजुली, बुद्धिमान्, वाणी, सत्य, बल, पराक्रम, राजनीति, सङ्ग्राम और शत्रुविजय आदि गुणों का वर्णन होने से इस अध्याय की पूर्वाध्याय के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद् विरजानन्द सरस्वती स्वामी के शिष्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वती स्वामिविरचित, सुप्रमाणयुक्त, आर्यभाषाविभूषित, ऋग्वेदभाष्य के चौथे अष्टक में सप्तम अध्याय पैंतीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल में सैंतालीसवाँ सूक्त भी समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजा आदि जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥