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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 30

75 Sukta
31 Mantra
6/47/30
Devata- दुन्दुभिः Rishi- गर्गः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ क्र॑न्दय॒ बल॒मोजो॑ न॒ आ धा॒ निः ष्ट॑निहि दुरि॒ता बाध॑मानः। अप॑ प्रोथ दुन्दुभे दु॒च्छुना॑ इ॒त इन्द्र॑स्य मु॒ष्टिर॑सि वी॒ळय॑स्व ॥३०॥

आ । क्र॒न्द॒य॒ । बल॑म् । ओजः॑ । नः॒ । आ । धाः॒ । निः । स्त॒नि॒हि॒ । दुः॒ऽइ॒ता । बाध॑मानः । अप॑ । प्रो॒थ॒ । दु॒न्दु॒भे॒ । दु॒च्छुनाः॑ । इ॒तः । इन्द्र॑स्य । मु॒ष्टिः । अ॒सि॒ । वी॒ळय॑स्व ॥

Mantra without Swara
आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि दुरिता बाधमानः। अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व ॥

आ। क्रन्दय। बलम्। ओजः। नः। आ। धाः। निः। स्तनिहि। दुःऽइता। बाधमानः। अप। प्रोथ। दुन्दुभे। दुच्छुनाः। इतः। इन्द्रस्य। मुष्टिः। असि। वीळयस्व ॥३०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 35 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(दुन्दुभे) दुन्दुभी के समान वर्त्तमान ! आप (नः) हम लोगों के लिये (बलम्) सामर्थ्य को और (ओजः) पराक्रम को (आ, धाः) धरिये और शत्रुओं को (आ) सब ओर से (क्रन्दय) रुलाइये और बुलाइये तथा हम लोगों को (निः) अत्यन्त (स्तनिहि) शब्द कराइये और (दुरिता) दुष्ट व्यसनों को (बाधमानः) नष्ट करते हुए (दुच्छुनाः) दुष्ट कुत्तों के समान वर्त्तमान शत्रुओं के (अप, प्रोथ) जीतने को पर्याप्त हूजिये अर्थात् शत्रुओं को असमर्थ करिये जिससे आप (इन्द्रस्य) बिजुली की (मुष्टिः) मुष्टि के समान दुष्टों के मारनेवाले (असि) हो (इतः) इससे हम लोगों को (वीळयस्व) बलयुक्त करिये ॥३०॥
Essence
हे राजन् ! आप ऐसे बल को धारण करिये जिससे दुष्ट व्यसन, और दुष्ट शत्रु नष्ट होवें और प्रजाओं के पोषण करने को समर्थ होवें ॥३०॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥