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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 3

75 Sukta
31 Mantra
6/47/3
Devata- सोमः Rishi- गर्गः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं मे॑ पी॒त उदि॑यर्ति॒ वाच॑म॒यं म॑नी॒षामु॑श॒तीम॑जीगः। अ॒यं षळु॒र्वीर॑मिमीत॒ धीरो॒ न याभ्यो॒ भुव॑नं॒ कच्च॒नारे ॥३॥

अ॒यम् । मे॒ । पी॒तः । उत् । इ॒य॒र्ति॒ । वाच॑म् । अ॒यम् । म॒नी॒षाम् । उ॒श॒तीम् । अ॒जी॒ग॒रिति॑ । अ॒यम् । षट् । उ॒र्वीः । अ॒मि॒मी॒त॒ । धीरः॑ । न । याभ्यः॑ । भुव॑नम् । कत् । च॒न । आ॒रे ॥

Mantra without Swara
अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः। अयं षळुर्वीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे ॥

अयम्। मे। पीतः। उत्। इयर्ति। वाचम्। अयम्। मनीषाम्। उशतीम्। अजीगरिति। अयम्। षट्। उर्वीः। अमिमीत। धीरः। न। याभ्यः। भुवनम्। कत्। चन। आरे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 30 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (अयम्) यह (पीतः) पान किया गया सोमलता का रस (मे) मेरी (वाचम्) वाणी को (उशतीम्) कामना करती हुई (मनीषाम्) बुद्धि को (उत्, इयर्त्ति) बढ़ाता है जिससे (अयम्) यह जन कामना को (अजीगः) प्राप्त होता है जिससे (अयम्) यह (षट्) छः प्रकार की (उर्वीः) भूमियों को (धीरः) ध्यान करनेवाला बुद्धिमान् जन (न) जैसे (अमिमीत) निर्म्माण करता है और (याभ्यः) जिन से (आरे) दूर वा समीप में (कत्) कभी (चन) भी (भुवनम्) संसार को रचता है, यह वैद्यकशास्त्र की रीति से बनाने योग्य है ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिस पिये हुए से वाणी, बुद्धि, शरीर बढ़े और जिससे शास्त्र उत्तम प्रकार ग्रहण किये जायें, इसका ही सेवन करना चाहिये, न कि बुद्धि आदिकों के नाश करनेवाले का ॥३॥
Subject
फिर वह सोम ओषधि क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

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