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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 27

75 Sukta
31 Mantra
6/47/27
Devata- रथः Rishi- गर्गः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्योज॒ उद्भृ॑तं॒ वन॒स्पति॑भ्यः॒ पर्याभृ॑तं॒ सहः॑। अ॒पामो॒ज्मानं॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑त॒मिन्द्र॑स्य॒ वज्रं॑ ह॒विषा॒ रथं॑ यज ॥२७॥

दि॒वः । पृ॒थि॒व्याः । परि॑ । ओजः॑ । उत्ऽभृ॑तम् । व॒न॒स्पति॑ऽभ्यः । परि॑ । आऽभृ॑तम् । सहः॑ । अ॒पाम् । ओ॒ज्मान॑म् । परि॑ । गोभिः॑ । आऽवृ॑तम् । इन्द्र॑स्य । वज्र॑म् । ह॒विषा॑ । रथ॑म् । य॒ज॒ ॥

Mantra without Swara
दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः। अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज ॥

दिवः। पृथिव्याः। परि। ओजः। उत्ऽभृतम्। वनस्पतिऽभ्यः। परि। आऽभृतम्। सहः। अपाम्। ओज्मानम्। परि। गोभिः। आऽवृतम्। इन्द्रस्य। वज्रम्। हविषा। रथम्। यज ॥२७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 35 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप (दिवः) बिजुली से वा सूर्य्य से (पृथिव्याः) भूमि वा अन्तरिक्ष से (वनस्पतिभ्यः) वट आदि वनस्पतियों से (ओजः) बल (उद्भृतम्) उत्तम रीति से धारण किया गया वा (सहः) बल (परि) सब प्रकार से (आभृतम्) सन्मुख धारण किया गया और (गोभिः) किरणों से (अपाम्) जलों के (ओज्मानम्) बलकारी (परि) सब ओर से (आवृतम्) ढाँपे गये (इन्द्रस्य) बिजुली के (वज्रम्) प्रहार को और (रथम्) विमान आदि वाहन विशेष को (हविषा) सामग्री के दान से (परि, यज) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ॥२७॥
Essence
जो मनुष्य सब ओर से बल को ग्रहण करके जलों के बलकारी मेघ को जैसे वैसे सुख को वर्षाते हैं, वे सब प्रकार से सत्कृत होते हैं ॥२७॥
Subject
फिर मनुष्यों को किन से उपकार ग्रहण करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥