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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 26

75 Sukta
31 Mantra
6/47/26
Devata- रथः Rishi- गर्गः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वन॑स्पते वी॒ड्व॑ङ्गो॒ हि भू॒या अ॒स्मत्स॑खा प्र॒तर॑णः सु॒वीरः॑। गोभिः॒ संन॑द्धो असि वी॒ळय॑स्वास्था॒ता ते॑ जयतु॒ जेत्वा॑नि ॥२६॥

वन॑स्पते । वी॒ळुऽअ॑ङ्गः । हि । भू॒याः । अ॒स्मत्ऽस॑खा । प्र॒ऽतर॑णः । सु॒ऽवीरः॑ । गोभिः॑ । सम्ऽन॑द्धः । अ॒सि॒ । वी॒ळय॑स्व । आ॒ऽस्था॒ता । ते॒ । ज॒य॒तु॒ । जेत्वा॑नि ॥

Mantra without Swara
वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः। गोभिः संनद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि ॥

वनस्पते। वीळुऽअङ्गः। हि। भूयाः। अस्मत्ऽसखा। प्रऽतरणः। सुऽवीरः। गोभिः। सम्ऽनद्धः। असि। वीळयस्व। आऽस्थाता। ते। जयतु। जेत्वानि ॥२६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 35 Mantra » 1

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Meaning
हे (वनस्पते) किरणों के पालन करनेवाले सूर्य्य के समान वर्त्तमान (हि) जिससे (वीङ्वङ्गः) बलिष्ठ अङ्ग जिसके वह (प्रतरणः) पार करनेवाले (सुवीरः) अच्छे प्रकार वीरों से युक्त (गोभिः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों के साथ (सन्नद्धः) अच्छे प्रकार तैयार हुए आप (असि) हो इससे (अस्मत्सखा) हम लोगों के मित्र (भूयाः) हूजिये और (आस्थाता) स्थिति से युक्त हुए हम लोगों को (वीळयस्व) दृढ़ कराइये (ते) आपकी सेना (जेत्वानि) जीतने योग्य शत्रुओं की सेनाओं को (जयतु) जीते ॥२६॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक बलवान् के साथ मित्रता करें, जिससे सर्वदा विजय हो ॥२६॥
Subject
फिर वह राजा कैसे मित्रों की इच्छा करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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