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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 25

75 Sukta
31 Mantra
6/47/25
Devata- प्रस्तोकस्य सार्ञ्जयस्य दानस्तुतिः Rishi- गर्गः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
महि॒ राधो॑ वि॒श्वज॑न्यं॒ दधा॑नान्भ॒रद्वा॑जान्त्सार्ञ्ज॒यो अ॒भ्य॑यष्ट ॥२५॥

महि॑ । राधः॑ । वि॒श्वऽज॑न्यम् । दधा॑नान् । भ॒रत्ऽवा॑जान् । स॒र्ञ्ज॒यः । अ॒भि । अ॒य॒ष्ट॒ ॥

Mantra without Swara
महि राधो विश्वजन्यं दधानान्भरद्वाजान्त्सार्ञ्जयो अभ्ययष्ट ॥

महि। राधः। विश्वऽजन्यम्। दधानान्। भरत्ऽवाजान्। सर्ञ्जयः। अभि। अयष्ट ॥२५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 34 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सार्ञ्जयः) अनेक प्रकार के न्याययुक्त व्यवहारों को बनानेवाले का सन्तान (महि) बड़े (विश्वजन्यम्) संसार से वा सम्पूर्ण से उत्पन्न होने योग्य वा सम्पूर्ण सुख को उत्पन्न करनेवाले (राधः) धन को (दधानान्) धारण करनेवाले (भरद्वाजान्) अन्न आदि के धारणकर्त्ताओं के (अभि, अयष्ट) सन्मुख जावे, मेघावी वह राजा चक्रवर्ती होवे ॥२५॥
Essence
जो ब्रह्मचर्य्य से शरीर और आत्मा को बलिष्ठ कर और सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को बढ़ाय के उत्तम पुरुषों को ग्रहण करता है, वही राजा राज्य के बढ़ाने के योग्य होवे ॥२५॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥