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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 21

75 Sukta
31 Mantra
6/47/21
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दि॒वेदि॑वे स॒दृशी॑र॒न्यमर्धं॑ कृ॒ष्णा अ॑सेध॒दप॒ सद्म॑नो॒ जाः। अह॑न्दा॒सा वृ॑ष॒भो व॑स्न॒यन्तो॒दव्र॑जे व॒र्चिनं॒ शम्ब॑रं च ॥२१॥

दि॒वेऽदि॑वे । स॒ऽदृशीः॑ । अ॒न्यम् । अर्ध॑म् । कृ॒ष्णाः । अ॒से॒ध॒त् । अप॑ । सद्म॑नः । जाः । अह॑न् । दा॒सा । वृ॒ष॒भः । व॒स्न॒यन्ता॑ । उ॒दऽव्र॑जे । व॒र्चिन॑म् । शम्ब॑रम् । च॒ ॥

Mantra without Swara
दिवेदिवे सदृशीरन्यमर्धं कृष्णा असेधदप सद्मनो जाः। अहन्दासा वृषभो वस्नयन्तोदव्रजे वर्चिनं शम्बरं च ॥

दिवेऽदिवे। सऽदृशीः। अन्यम्। अर्धम्। कृष्णाः। असेधत्। अप। सद्मनः। जाः। अहन्। दासा। वृषभः। वस्नयन्ता। उदऽव्रजे। वर्चिनम्। शम्बरम्। च ॥२१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 34 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (जाः) प्रकट हुआ सूर्य्य (दिवेदिवे) प्रतिदिन (सदृशीः) तुल्यस्वरूपयुक्त (कृष्णाः) खराब वर्णवाली वा खोदी गई पृथिवियों और (अन्यम्) अन्य (अर्द्धम्) आधे को (च) भी (असेधत्) अलग करता है और (सद्मनः) निवास करते हैं जिसमें उस गृह के अन्धकार को (अप) अलग करता है तथा (वृषभः) वृष्टि करनेवाला (उदव्रजे) जल जाते हैं जिसमें उसमें (वर्चिनम्) प्रकाशमान (शम्बरम्) मेघ का (अहन्) नाश करता है, वैसे (वस्नयन्ता) निवास करते हुए के समान आचरण करते हुए राजा और प्रजाजन (दासा) उपेक्षा करनेवाले हुए वर्त्ताव करें ॥२१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य और मेघ समस्त पृथिवी का आकर्षण कर प्रकाश और जलयुक्त करते हैं वा जैसे सूर्य इस पृथिवी के अर्द्धभाग को प्रकाशित करता और वर्षा को करता है तथा अन्धकार का निवारण कर सबको सुखी करता है, वैसे ही राजा और प्रजाजन सत्य को खैंच असत्य को त्याग कर अन्याय का निवारण कर न्याय का प्रचार कर और उत्तम विद्या के उपदेशों की वृष्टि कर सब मनुष्यों को सुखी करें ॥२१॥
Subject
फिर वे राजा और प्रजाजन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥